संपादकीय

चौकीदार कहते हो तो आओ मेरे खेतो की रक्षा करो “गोवंश” से

लोकसभा चुनावों का रण प्रारंभ हो चुका है। सुन रही हूं चौकीदार का नारा। सभी कह रहे है मैं भी चौकीदार हूं। भाई साहब बड़े चौकीदार बनते फिर रहे हो तो कृपया करके हिसार से आवारा घुम रहे “गौवंश” से हमारी चौकीदारी करके दिखाओ न। पता है कल सड़क हादसा होते होते रह गया, सुना है एचएयू के पास भी आपके कुछ चौकीदार रहते हैं। जिनके पास फोरव्हीलर गाडी है। कृपया करके उस चौकीदार को तो बोलिये वहां से आवारा घूम रही गाय और गोवंश को हटा कर हमारे जान की रक्षा और गायों की सेवा करे। कहेंगे न आप। जो भी आजकल राजनीति का चौकीदार बन कर घूम रहा है सुन रहा है न। कृपया करके भेज दीजिये अपने चौकीदार को। जिसने देश सेवा का जिम्मा उठाया है।
खैर पता नहीं “मैं भी चौकीदार हूं” का गाना भेजकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं के कानो तक मेरी यह आवाज जाएगी? खैर वैसे अनेक राजनैतिक दल इस बार मतदाताओं के मध्य तरह-तरह के वादों व आश्वासनों के साथ संपर्क साध रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से इस चुनाव में पूरा चुनावी विमर्श जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों से हटकर पूरी तरह से भावनाओं, राष्ट्रवाद, धर्म-जाति तथा भारत-पाकिस्तान जैसे विषयों की ओर मोड़नेे की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर विपक्षी दल बेरोज़गारी, मंहगाई, नोटबंदी, सांप्रदायिकता, जातिवाद तथा भ्रष्टाचार जैसे विषय लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। परंतु इस बार के चुनावों में गौवंश या गौरक्षा का विषय कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। न तो तथाकथित स्वयंभू गौरक्षकों की हमदर्द भारतीय जनता पार्टी की ओर से न ही विपक्षी दलों की तरफ से। यहां यह याद दिलाने की जरूरत नहीं कि 2014 से लेकर गत वर्ष तक पूरे देश में गौरक्षा तथा गाय को लेकर होने वाली हिंसा का बोलबाला रहा। नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान अपने चुनावी भाषणों में वादा किया था कि उनके सत्ता में आने के बाद यूपीए सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘गुलाबी क्रांति’ अर्थात बीफ मांस के व्यापार व निर्यात को बंद कर दिया जाएगा। परंतु सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। बजाए इसके आंकड़े यही बता रहे हैं कि बीफ निर्यात के क्षेत्र में यूपीए सरकार की तुलना में कहीं अधिक व्यवसाय बढ़ा है।
सवाल यह है कि गौवंश की रक्षा का विषय चुनावी सभाओं में उठाना तथा देश के गौभक्तों की भावनाओं को झकझोरना मात्र ही क्या इस विषय को उछालने का मकसद था? यह सोचना बेहद जरूरी है 2014 से लेकर 2019 के मध्य के पांच वर्षों के दौरान गौवंश का कितना कल्याण हुआ है? उसे राष्ट्रीय स्तर पर कितनी सुरक्षा व देखभाल मयस्सर हो सकी है? कल तक किसानों तथा आम लोगों के लिए वरदान समझा जाने वाला गौवंश क्या इन पांच वर्षों के दौरान भी आम लोगों के लिए लाभदायक व सहयोगी साबित हुआ है? देश के शहरी लोगों से लेकर ग्रामवासियों तक के लिए आज के समय में गौवंश लाभदायक साबित हो रहा है या हानिकारक? स्वयं गायों के पैदा होने वाले बछड़ों पर इन दिनों क्या गुजर रही है? खेतिहर किसानों के लिए आज गौवंश वरदान साबित हो रहा है या अभिशाप? गौरक्षा की बातें करने वाले तथा इसे अपनी राजनीति तथा व्यवसाय का सबसे महत्वपूर्ण कारक समझने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी इन दिनों गौवंश की रक्षा, सुरक्षा, स्वास्थय व देखभाल के लिए क्या कर रहे हैं? निश्चित रूप से मतदाताओं को चुनाव के समय तथाकथित स्वयंभू गौरक्षकों से यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए।
गौवंश की रक्षा के नाम पर गत पांच वर्षों में दक्षिणपंथियों द्वारा जो चंद गिने-चुने कदम उठाए जा रहे थे उनमें या तो किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के िफ्रज अथवा रसोई में रखे हुए मांस को लेकर हंगामा बरपा करना तथा किसी कमजोर व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर देना शामिल रहा या फिर गौवंश के साथ आते-जाते किसी अकेले व्यक्ति पर धर्म के आधार पर टृट पड़ना व उसे पीट-पीट कर मार डालना। इन घटनाओं से न तो गौवंश की रक्षा हो सकी न ही इसके बिक्री अथवा निर्यात पर कोई अंकुश लग सका। हां इतना फर्क ज़रूर पड़ा कि स्वयंभू गौरक्षकों द्वारा रास्ते में की जा रही नाजायज वसूली, मारपीट व हिंसा से भयभीत होकर लोगों ने गौवंश का व्यापार करना ही छोड़ दिया। ट्रांसपोर्टस ने भी गौवंश लादने व लाने-ले जाने हेतु अपनी ट्रकों को भेजना बंद कर दिया। इसका सीधा प्रभाव उन गौपालकों पर पड़ा जो अपनी गायों का दूध कम हो जाने की स्थिति में उस गाय को किसी व्यापारी को बेच दिया करते थे तथा अधिक दूध देने वाली गाय खरीद कर लाया करते थे।
परंतु ट्रकों के उपलब्ध न होने तथा व्यापारियों द्वारा गौवंश की खरीददारी बंद कर देने के परिणामस्वरूप अब स्थिति बहुत ही खतरनाक मोड़ पर आ गई है। जिन गायों से गौपालक किसी फायदे की उम्मीद नहीं रखता उसे अपने घर के बाहर का रास्ता दिखा रहा है। हद तो यह है कि पैदा होते ही गायों के बछड़े सड़कों पर छोड़े जा रहे हैं।
पूरे देश में इस समय गौवंश के सड़कों पर घूमने के चलते दुर्घटनाओं में काफी तेजी आई है। पैदल, साईकल सवार व कार अथवा मोटरसाईकल पर चलने वाला कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इस प्रकार के आक्रामक आवारा पशुओं का शिकार हो सकता है। शहरों के अलावा गांवों की स्थिति तो पहले से भी ज्यादा खराब हो चुकी है। देश के मैदानी इलाकों का जो किसान पहले नील गाय के झुंड से ही बेहद परेशान था उसके लिए अब गाय व सांड जैसे आवारा पशुओं के झुंड भी एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। कई जगहों से ऐसी खबरें आती रहती हैं कि इन दिनों गेहूं की फसल की रखवाली करने हेतु किसानों के परिवार के लोग 24 घंटे हाथों में लाठियां लेकर आवारा पशुओं से अपनी फसल की चौकीदारी करने में डटे हुए हैं। उधर किसानों के गुस्से के चलते तथा शहरों में वाहन से होने वाली दुर्घटनाओं की वजह से गौवंश को भी मनुष्यों की हिंसा या आक्रामकता का सामना करना पड़ रहा है। चंडीगढ़ जैसे महानगर में चारों ओर यहां तक कि शहर के बीचो-बीच चंडीगढ़-दिल्ली राजमार्ग पर कई बार ऐसे आवारा पशुओं के बड़े-बड़े झुंड न केवल यातायात को बाधित कर रहे हैं बल्कि कई बार सड़कों पर सांडों के मल्लयुद्ध भी दिखाई दे जाते हैं। इसके कारण कई लोगों की कारों के शीशे टूट चुके हैं व गाड़ियांं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। कई लोग घायल हो चुके हैं।
पिछले दिनों देश के एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा गुजरात-महाराष्ट्र के मध्य एक स्टिंग आप्रेशन कर तथाकथित गौरक्षकों की हकीकत का पर्दाफाश किया गया था। उन्होंने दिखाया कि किस प्रकार दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोग मोटे पैसे लेकर वध हेतु जाने वाले गौवंश को मुख्य मार्गों से आने-जाने की अनुमति देते हैं।
स्टिंग करने वाले पत्रकार निरंजन टाकले ने स्वयं एक गौवंश व्यवसायी की भूमिका अदा करते हुए ऐसे अनेक तथाकथित गौरक्षकों को बेनकाब किया जो केवल पैसे ठगने व वसूलने की खातिर गौरक्षा के नाम का आवरण अपने ऊपर चढ़ाए हुए थे। परंतु हमारे देश के धर्मभीरू लोग इन पाखंडी तथाकथित गौरक्षकों तथा इन्हें संचालित करने वाले शातिर दिमाग राजनीतिज्ञों के झांसे में आ जाते हैं और यह महसूस करने लगते हैं कि वास्तव में यही लोग गौमाता के असल रखवाले हैं जबकि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है? अन्यथा क्या वजह है कि देश में चलने वाले अधिकांश कत्लखाने सत्ता के संरक्षण में सत्ता के चहेतों द्वारा ही संचालित किए जा रहे हैं? क्या वजह है कि यूपीए सरकार की तुलना में वर्तमान सरकार के दौर में गत पांच वर्षों में बीफ निर्यात में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है?
इसलिए ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा बुलंद करने वालों से देश के किसानों को यह जरूर कहना चाहिए कि वे आएं और सबसे पहले उनके खेतों की चौकीदारी कर उनकी फसल की रक्षा करें।
शहरी लोगों को भी इन स्वयंभू चौकीदारों से यह कहना चाहिए कि यह चौकीदार शहरों में घूमने वाले आवारा पशुओं के हमलों से उनकी चौकीदारी करें। इतना ही नहीं बल्कि बेजुबान गौवंश को भी इन्हीं चौकीदारों से यह सवाल पूछना चाहिए कि पांच वर्षों तक उसकी सुरक्षा के नाम पर जो उन्माद पूरे देश में फैलाया गया उसके बाद आखिर इन पांच वर्षों में उन्हें सड़कों पर और बड़ी संख्या में दर-दर भटकने के लिए तथा कूड़ों के ढेर पर प्लास्टिक व पॉलिथिन खाने व वाहनों की टक्कर झेल कर घायल होने के लिए क्यों छोड़ दिया गया? केवल टीर्शर्टस पर ‘मैं भी चौकीदार’ लिखे जाने से न तो गौवंश की रक्षा हो सकती है न ही किसानों की फसल की, न ही शहरी राहगीरों की।

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