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चुनावी दंगल:आगामी चुनाव में सोशल मीडिया की होगी अहम भूमिका

Hisar Today

22 सितम्बर को भाजपा राष्ट्री अध्यक्ष अमित शाह ने एक सभा को सम्बोधित करते हुए ऐसी बात कही जिसने सोशल मीडिया के जहर को उजागर कर दिया। अमित शाह ने एक उदाहरण देकर बताया कि कैसे किसी ने व्हाट्सअप में झूठी खबर डाली की अखिलेश ने नेताजी को थप्पड़ मार दिया। देखते ही देखते यह खबर वायरल हो गई और इसका असर पिछले चुनाव में क्या हुआ यह तो आपने देखा ही होगा न। सोशल मीडिया है ही कुछ ऐसा ब्रह्मजाल, जिसको लेकर कहावत मशहूर है, जितनी ऊंची छोड़ सकते हो, छोड़ते रहो। सोशल मीडिया में, जाहिर तौर पर इस तकिया कलाम को लोग बहुत पसंद कर रहे है। खास झुकाव वाली राजनीतिक सोच, उपभोक्ताओं को प्रभावित करना, या बस यूं ही जनता के एक हिस्से को ट्रोल करना, फेक न्यूज आइटम कई उद्देश्यों को हासिल करने के लिए बनाए जाते हैं।

ये हर जगह हैं और ये भी मुमकिन है आप भी इनमें से किसी का शिकार बन चुके हों। वेब की दुनिया के लोकतांत्रिक स्वरूप और खुलेपन ने इंटरनेट तक हर किसी की पहुंच बना दी। इस पर नाममात्र की सेंसरशिप के साथ कंटेंट साझा किया जा रहा है, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं। पाया गया है कि 60 फीसद से अधिक भारतीय पत्रकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल खबरों के स्रोत के तौर पर करते हैं। सोशल मीडिया सभी के लिए सूचना हासिल करने और साझा करने की पसंदीदा जगह बन चुका है। आभाषी नागरिकों के इसी विशाल संसार के नेटवर्क का इस्तेमाल फेक न्यूज के लिए भी किया गया और दुष्प्रचार से दर्शकों को भ्रमित किया गया। पोस्ट ट्रुथ (तर्क और तथ्यों के बजाय भावनात्मक अपीलों से कोई बात स्थापित करना) के इस दौर में सच को झूठ से कैसे अलग किया जा सकता है?

भारत में 16.6 करोड़ लोग फेसबुक़ का इस्तेमाल करते हैं, जो कि रूस, श्रीलंका और न्यूज़ीलैंड की कुल आबादी से अधिक है। यह एक हकीकत है, लेकिन फेसबुक पर हर चीज़ ग्रहण करने के योग्य नहीं है। कहते है सोशल मीडिया में बड़ी ताकत होती है। जब इतनी आबादी सोशल मीडिया पर है तो यह चुनाव में भी असर डालने का सभी राजनीति पार्टी के लिए आसान और सस्ता साधन है। 2008 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव वह पहला चुनाव था, जिसके बारे में कहा गया था कि इसे सोशल मीडिया पर लड़ा गया। ओबामा की ट्विटर और फेसबुक की टीम ने वोटरों तक उनका एजेंडा ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे पहले के अमेरिकी चुनावों के बारे में कहा जाता था कि वे टेलीविजन पर लड़े जाते थे। चुनाव के नतीजे कई बार उम्मदवारो के बीच टीवी बहस में उनकी परफॉर्मेंस से तय हो जाते थे। लेकिन अब यह बदल चुका है।

मास कम्युनिकेशन यानी जनसंचार की दृष्टि से 2008 का साल अमेरिका के लिए एक प्रस्थान बिंदु रहा, जिसके बाद वहां सब कुछ वैसा नहीं रहा, जैसा पहले था। इस बात पर मुहर लगाते हुए बराक ओबामा की व्हाईट हाउस में हुई पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहली बार एक ब्लॉगर को बुलाया गया। अब यह एक आम चलन है। उसी साल कोलंबिया जर्नलिज्म रिव्यू में द बिगर टेंट नाम का एक पेपर छपा था, जिसमें कहा गया है कि पत्रकारिता अब बदल चुकी है और दुनिया अब लाखों पत्रकारों के युग में पहुंच गई है। इसी के साथ अब भारत के लिए भी चुनाव प्रचार का नया युग है सोशल मीडिया। भारत में क्या वह समय आ चुका है, जब कहा जाएगा कि यहां के चुनाव भी इंटरनेट पर लड़े जाते हैं? इस साल 2 फरवरी को सोशल मीडिया के सबसे बड़े खिलाड़ी फेसबुक ने अपनी चौथी तिमाही के नतीजे जारी किए। इसमें आमदनी और मुनाफे के हिसाब के साथ यह भी बताया कि किस देश में फेसबुक के कितने यूजर हैं और उसमें बढ़ोतरी की रफ्तार कितनी है। फेसबुक के ग्लोबल बिजनेस में इस तिमाही में सबसे तेज बढ़ोतरी भारत में हुई है। इतना ही नहीं, भारत में फेसबुक यूजर की संख्या अब 16.5 करोड़ को पार कर चुकी है। यानी भारत का हर 9वां आदमी अब हर महीने कम से कम एक बार फेसबुक का इस्तेमाल करता है।

व्हाट्सएप्प के पिछले साल नवंबर तक के आंकड़े आए हैं और उसके यूजर्स की संख्या भी 16 करोड़ को पार कर चुकी है। जाहिर है कि अब यह संख्या और बढ़ चुकी होगी। भारत अब अमेरिका के बाद फेसबुक का सबसे बड़ा बाजार है। व्हाट्सएप्प का भारत दुनिया में सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन हर 9वें आदमी के फेसबुक या व्हाट्सएप्प से जुड़े होने का यह भी मतलब है कि हर नौ में से आठ आदमी फेसबुक-व्हाट्सएप्प से बाहर हैं। इसमें अगर नाबालिग आबादी को छोड़ दिया जाए, जो वोटर नहीं है, तो भी जितने लोग फेसबुक-व्हाट्सएप्प से जुड़े हैं, उनसे कई गुणा ज्यादा लोग सोशल मीडिया से बाहर है।

लोग अपनी जानकारी समाज के ही किसी और व्यक्ति से लेते हैं। वह व्यक्ति ओपिनियन लीडर होता है, जिसकी बात सुनी और कई बार मानी जाती है। इसे टू स्टेप थ्योरी कहते हैं। सीधे मीडिया ने कुछ कहा या दिखाया और लोगों ने उसे मान लिया, यह कम ही होता है। दरअसल राजनीतिक दल जब सोशल मीडिया पर प्रचार करने पर इतना जोर दे रहे होते हैं, तब उनका मकसद इन ओपिनियन लीडर्स तक पहुंचना होता है। भारत जैसे देश में यह माना जा सकता है कि जिस आदमी की सोशल मीडिया तक पहुंच है, उसे आर्थिक और सामाजिक तौर पर एक दर्जा हासिल है। किसी व्यक्ति के सोशल मीडिया तक पहुंच का मतलब है कि उसके पास मोबाइल फोन या कंप्यूटर और इंटरनेट होगा। इसके अलावा उसे इंग्लिश भाषा की न्यूनतम जानकारी जरूर होगी। ऐसा आदमी अपने समाज, बिरादरी में ओपिनियन लीडर होगा, इसकी संभावना बहुत ज्यादा है। इसलिए भारत में जब एक राजनीतिक दल सोशल मीडिया के जरिए 16.5 करोड़ लोगों तक पहुंचने का इरादा रखता है, तब उसकी नजर उन बाकी लोगों पर भी होती है, जो खुद सोशल मीडिया से जुड़े नहीं हैं, लेकिन हो सकता है कि वे ऐसे लोगों से प्रभावित होते हों। सोशल मीडिया का प्रचार आसान और सस्ता भी है।

सोशल मीडिया के वर्चुअल कैंपेन का रियल दुनिया में विस्तार की संभावना कई रास्ते खोल रहे है और ढेरों सवाल भी खड़े कर रही है। मिसाल के तौर पर, क्या जो पार्टी सोशल मीडिया में आगे रहेगी, उसके चुनाव जीतने का ज्यादा संभावना होगी? या क्या किराए पर लोग रखकर सोशल मीडिया में बनाई गई चुनावी हवा मतदाताओं के वोटिंग व्यवहार को प्रभावित करती है? या जिन सामाजिक समूहों में अभी इंटरनेट का ज्यादा विस्तार नहीं हुआ है, जैसे दलित, आदिवासी, मुसलमान और ग्रामीण, उन समाजों में यह परिघटना किस रूप में असर दिखाएगी? इंटरनेट का विस्तार जब इन समुदायों में भी समरूप में हो जाएगा, तो क्या इसका असर राजनीतिक प्रक्रिया पर पड़ेगा और वह किस रूप में होगा? फिलहाल इनमें से ज्यादातर सवाल अनुत्तरित है। ऐसे और कई सवाल आने वाले हैं। भारत में मीडिया के क्षेत्र में रिसर्च करने वालों के लिए ये कुछ चुनौती भरे प्रश्न हैं।

वैसे यह बात जगजाहिर है कि आज सोशल मीडिया का बाढ़ आने से भारत की तमाम राजनितिक पार्टी इसे ही अपना चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण अंग मानती है। पिछले 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह ने तो अपने सभी मंत्रियों को सोशल मीडिया में एक्टिव रहने के आदेश तक दिए थे। ऐसे में आज भाजपा से लेकर कांगेस पार्टी के लिए सोशल मीडिया चुनाव प्रचार और पार्टी की पॉलिसी और उनकी योजनाओ को लोगो तक पहुंचाने का जरिया बन चूका है। आलम आज यह है कि नेता भी अपने भाषण सीधे सोशल मीडिया के जरिये लोगो तक लाइव पहुंचने लगे है। किसी भी विवादित मुद्दे पर बोलना है तो अब प्रेस नहीं बल्कि सीधे सोशल मीडिया पर बयान दिया जाता है। इतना ही नहीं एक पार्टी दूसरे पार्टी का चरित्रहरण भी इसी सोशल मीडिया के जरिये करते देखा गया है।

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