संपादकीय

चीन की कूटनीति हो जायेगी विफल

Archana Tripathi,Today News

एक समय में चीन को ‘लाल आँख’ दिखाने की बात करने वाले नरेंद्र मोदी भी जानते है की आज चीन और भारत के संबंध पहले जैसे नहीं रह गए है। जो पडोसी मुल्क भारत के हितैशी और करीबी थे उन देशो की नजदीकियां भी इन दिनों चीन के साथ ज्यादा देखी जा रही है। मगर ऐसा क्यों? ऐसा क्या हो रहा है की भारत के पडोसी देश अब चीन के प्रति ज्यादा आश्रित होने लगे है? इन दिनों चीन के बुद्धिजीवियों का मानना है की चीन दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बनने की ललक में अपने मिशन पर निकल चूका है, और उसके इसी मिशन का एक रूप है चीन की महत्वकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट वन रो़ड़’ जिसे पूरा करने की जद्दोजहद में चीन जी-तोड़ मेहनत कर रहा है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) नामक इस परियोजना को शुरू हुए पांच साल हो चुके हैं। साल 2013 मे शुरू होने वाली इस परियोजना में 70 से अधिक देश जुड़ चुके हैं। मगर इस परियोजना को अंजाम देते हुए कई एशियाई देश इस परियोजना से नाखुश भी हैं जिसमे भारत भी शामिल है। जिसने खुद को हमेशा से ही इस परियोजना से अलग रखा है। चीन ने पिछले दिनों ‘वन बेल्ट, वन रोड’ पहल पर चर्चा के लिए 60 से अधिक देशों को आमंत्रित किया था, जिनमें अमेरिका, रूस, तुर्की आदि देश भी शामिल हैं। यह चीनी आर्थिक और विदेश नीति का जोरदार दावं माना जा रहा है। जानकार इसे आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी पहल के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, भारत को भी इसमें बुलाया गया था, पर इसका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों, कानूनों, पारदर्शिता और संप्रभुता को किनारे रख कर उठाये जानेवाले ऐसे कदम वैश्विक हितों के विरुद्ध हैं। भारत ने परियोजनाओं को पूरा करने की गारंटी, देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ने और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को प्रकट करते हुए इस परियोजना के औचित्य पर ही सवाल उठाया है।

इतना ही नहीं भारत का मानना है की इस प्रकार चीन दूसरे देशो को कर्ज देकर उन्हें आश्रित बनाकर खुद अपना वर्चस्व स्थापित करेगा, जो की खतरे की घंटी है। गौरतलब है की चीन के राष्ट्रपति इस परियोजना को ‘प्रोजेक्ट आॅफ द सेंचुरी’ बता चुके हैं। हालांकि भारत ने खुद को चीन की इस परियोजना से अलग किया हुआ है, लेकिन भारत के अलावा उसके कई पड़ोसी देश इस परियोजना में चीन के साथ हैं। दरअसल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बीआरआई का स्वागत उन देशों ने ज्यादा किया जहां का आधारभूत ढांचा बहुत अच्छा नहीं था। इन देशों में चीन ने रेलवे, सड़क और बंदरगाहों के निर्माण की कई योजनाएं शुरू की। लेकिन अब कई देश ऐसे हैं जो इस परियोजना में शामिल होने के बाद कुछ प्रोजेक्ट के बारे में दोबारा विचार कर रहे हैं, इन देशों में मलेशिया से लेकर म्यांमार तक शामिल हैं। चीन ने अपनी तरफ से काफी कोशिश की है कि वह परियोजना में शामिल देशों को यह समझा सके कि यह कितने फायदे का सौदा है, लेकिन फिर भी कई एशियाई देश इसकी आलोचना कर रहे हैं। इसके पीछे प्रमुख वजह चीन का “इन देशों में फ़ैलता कर्ज़ का जाल।”

बीआरआई परियोजना से पीछे हटने वाला सबसे नया देश मलेशिया है। जुलाई महीने में मलेशिया ने अपने देश में इस परियोजना के तहत चल रहे कुछ कामों को रोक दिया। रोक लगाने वाली योजनाओं में 2 हज़ार डॉलर की ईस्ट-कोस्ट रेल लिंक और गैस पाइपलाइन की दो योजनाएं शामिल हैं। मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद पिछले महीने चीन के दौरे पर गए थे लेकिन उस दौरे में भी इस समझौते को जारी रखने पर सहमति नहीं बन पाई। एशिया के दूसरे देशों में चल रही इस परियोजना पर भी अब ख़तरे के बादल मंडराने लगे हैं। श्रीलंका में चीन का निवेश अब जांच के दायरे में आने लगा है। खासतौर पर पश्चिमी मीडिया और अधिकारियों ने इस पर सवाल उठाए हैं। इनका आरोप है कि चीन अपने पड़ोसी देशों के साथ कर्ज़ बढ़ाने वाली कूटनीति कर रहा है। पिछले साल ही श्रीलंका ने अपना हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की एक फर्म को 99 साल के लिए सौंप दिया था। दरअसल श्रीलंका चीन की तरफ से मिले 140 करोड़ डॉलर का कर्ज चुका पाने में नाकाम था। इसके बाद 5 सितंबर को विपक्ष के हज़ारों नेताओं ने श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया और सरकार पर देश की संपत्ति बेचने का आरोप लगाया। इसी तरह श्रीलंका में चीन के एक और प्रोजेक्ट पर खतरा मंडरा रहा है, श्रीलंका के उत्तरी शहर जाफना में घर बनाने की चीन की योजना का विरोध हो रहा है। यहां लोगों ने कंक्रीट के घर की जगह ईंट के घरों की मांग की है।

चीन के सबसे करीबी और भरोसेमंद एशियाई दोस्त के तौर पर पाकिस्तान को देखा जाता है. पाकिस्तान चीन के साथ अपनी मित्रता को ‘हर-मौसम में चलने वाली दोस्ती’ के रूप में बयां करता है। लेकिन बीआरआई परियोजना के संबंध में पाकिस्तान ने भी थोड़ा-थोड़ा नाराज़गी ज़ाहिर करना शुरू कर दिया है। दरअसल पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या उसका बढ़ता कर्ज़, पारदर्शिता का अभाव और सुरक्षा व्यवस्था है। बीआरआई के तहत चीन-पाकिस्तान के बीच एक आर्थिक गलियारा बनाने पर काम हो रहा है, इसके लिए कुल 6 हज़ार करोड़ डॉलर का खर्च सुनिश्चित हुआ है। पाकिस्तान के लिए यही रकम जी का जंजाल बन रहा है। फिलहाल पाकिस्तान की जैसी आर्थिक हालत चल रही है और अमेिरका की तरफ से उन पर लगातार दबाव बढ़ाया जा रहा है, उस हाल में पाकिस्तान चीन के साथ किसी तरह का मनमुटाव नहीं करना चाहेगा। श्रीलंका की तरह म्यांमार भी अपने ऊपर बढ़ते चीनी कर्ज के चलते दबाव महसूस करने लगा है। यही वजह है कि वह बीआरआई से हटना चाह रहा है। म्यांमार के रखाइन प्रांत में क्योकप्यू शहर के तट पर चीन पानी के अंदर एक बंदरगाह बनाने पर काम कर रहा है।

इसकी शुरुआती कीमत 730 करोड़ डॉलर आंकी गई लेकिन हाल ही में म्यांमार के उप वित्त मंत्री सेट ऑन्ग ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया था कि यह प्रोजेक्ट लगातार छोटा होता जा रहा है। अब इस प्रोजेक्ट को कम करके इसका खर्च 130 करोड़ डॉलर पर लाया जा चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लगातार घटते चले जाने के पीछे खर्च के साथ-साथ चीन की अपने पड़ोसी देशों में कब्जा जमाने वाली छवि भी है। इसी डर के चलते म्यांमार चीन के साथ इस परियोजना बहुत ज़्यादा बड़ा नहीं बनाना चाहता। साल 2011 में म्यांमार सरकार ने चीन के साथ 360 करोड़ डॉलर वाली मितसोन बांध परियोजना इसी वजह से रद्द कर दी थी क्योंकि उस समय भी म्यांमार के आम नागरिकों और विपक्षी दलों ने चीन का विरोध किया था। हालांकि तमाम रुकावटों के बावजूद, चीन लगातार म्यांमार के समर्थन में बना रहा फिर चाहे रोहिंग्या संकट पर म्यांमार की चौतरफा आलोचना का ही विषय क्यों न हो।

इंडोनेशिया में बन रहा जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क लगातार पीछे खिसकता जा रहा है, इसकी प्रमुख वजहों में भूमि अधिग्रहण, लाइसेंस और फंड की समस्या है। 500 करोड़ डॉलर की चीन की यह परियोजना साल 2015 में शुरू हुई थी और इसकी डेडलाइन साल 2019 है। जकार्ता ग्लोब में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इंडोनेशिया के नेता लुहुत पंडजाइतन ने कहा है कि फिलहाल तो ऐसा लगता है कि साल 2014 से पहले इस नेटवर्क पर रेल नहीं चल पाएगी। इससे पहले इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो भी इस प्रोजेक्ट पर दोबारा विचार करने की बात कह चुके हैं क्योंकि जकार्ता से बांडुंग की दूरी महज 140 किलोमीटर ही है। वहीं दूसरी तरफ चीनी मीडिया में इस प्रोजेक्ट को काफी सफल बताया जा रहा है और ऐसे रिपोर्ट की जा रही है कि इस प्रोजेक्ट के चलते इंडोनेशिया में कई स्थानीय लोगों को नौकरियां मिली हैं। इंडोनेशिया में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में यहां चीन-विरोधी विचार भी लगातार उठ रहे हैं।

दरहसल चीन की कर्ज कूटनीति का मायने बेहद अलग है, इस जरिए राष्ट्रपति जिनपिंग अमेरिका के द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पुनर्निर्माण के लिए बने मार्शल प्लान को अधिक साहसी स्वरूप में लाने को लेकर बहुत अग्रसर हैं। इससे,अमेरिका ने यूरोप के सहयोगी देशों को सुरक्षित करने के लिए भारी मदद दी थी। चीन सैकड़ों बिलियन डॉलर का सरकार-समर्थित कर्ज बांट रहा है, ताकि दुनियाभर में उसके नये दोस्त बन सकें। इस बार सैन्य जिम्मेवारियों की जरूरत के बिना यह सब हो रहा है। चीनी राष्ट्रपति की योजना राष्ट्रपति ट्रंप और उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ मंत्र के बिल्कुल विपरीत है। ट्रंप प्रशासन ने ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप से हाथ खींच लिया है, जो कि अमेरिका के नेतृत्व में बना एक व्यापारिक समझौता था, जिसकी स्थापना चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोकने के लिए की गयी थी।

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