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गुरूग्राम में राव इंद्रजीत सिंह ने छोड़ा कमल का साथ तो जीत मुश्किल

Hisar Today

हरियाणा की आर्थिक गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र गुरूग्राम है तो निश्चित ही राजनैतिक रूप से भी इस सीट का महत्व काफी बढ़ जाता है। वैसे तो देश के पहले आम चुनावों के समय से ही गुरूग्राम लोकसभा सीट अस्तित्व में आ गई थी, लेकिन 1977 के आम चुनावों से पहले हुए परीसिमन में इसका वजूद खत्म कर दिया गया था। तकरीबन तीन दशक बाद 2009 के आम चुनावों के समय फिर से गुरूग्राम लोकसभा सीट अस्तित्व में आई है। वैसे इस सीट पर ज्यादातर कांग्रेस का ही दबदबा रहा है, लेकिन 2014 में देशव्यापी मोदी लहर में कांग्रेस का यहां वर्चस्व टूट गया और पहली बार बीजेपी ने इस सीट पर कब्जा जमाया। 1952 के प्रथम आम चुनावों में इस सीट पर कांग्रेस के पंडित ठाकुर दास विजयी हुए थे, जबकि 1957 में यह सीट दोहरी सदस्यता वाली बना दी गई थी। तब एक सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा जाने-माने शिक्षाविद मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने विजय पताका फहराई थी तो दूसरी सीट से निर्दलीय प्रकाश वीर शास्त्री विजयी हुए थे।

नरेंद्र मोदी व बीजेपी के प्रति लोगों के बढ़ते रूझान को देखकर 2014 के चुनावों से पहले राव इंद्रजीत सिंह कांग्रेस का ‘हाथ’ झटक कर बीजेपी में शामिल हो गए थे और बीजेपी ने भी उन्हें हाथों हाथ लिया तथा उन्हें इस सीट पर अपना प्रत्याशी घोषित करने में कोई चूक नहीं की। बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर राव इंद्रजीत सिंह गुरुग्राम सीट पर भारी मतों के अंतर से कब्जा जमाने में सफल रहे। गुरुग्राम लोकसभा सीट के तहत नौ विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से चार विधानसभा क्षेत्र गुरुग्राम शहर, सोहना, बादशाहपुर और पटौदी गुरुग्राम जिले के अंतर्गत पड़ते हैं, जबकि नूंह, फिरोजपुर झिरका और पुन्हाना विधानसभा क्षेत्र जिला नूंह (पुराना नाम मेवात) के अंतर्गत आते हैं। दो विधानसभा क्षेत्र – बावल व रिवाड़ी शहर साथ लगते रिवाड़ी जिले के तहत पड़ते हैं। इनमें से बावल, रिवाड़ी, पटौदी और बादशाहपुर अहीर बहुल इलाके हैं जबकि नूंह, पुन्हाना और फिरोजपुर झिरका में मेव यानि मुस्लिम मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। गुरूग्राम में बड़े फैक्टर अहीर (यादव) और मेव (मुस्लिम) मतदाता ही माने जाते हैं।इस बार गुरूग्राम में स्थिति काफी उलझी हुई है।

पिछली बार के विजेता राव इंद्रजीत सिंह अंदरखाने बीजेपी नेतृत्व से रूष्ट बताए जाते हैं। वे बीजेपी नेताओं द्वारा उनसे (राव इंद्रजीत) किए गए वायदों पर खरा न उतर पाने से खफा है। रह-रह कर चर्चाएं सुनाई पड़ती रहती है कि चुनावों से पहले राव इंद्रजीत सिंह बीजेपी को अलविदा कह देंगे। इन चर्चाओं में कितना दम है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन यह तय है कि सीटिंग एमपी होने के नाते उनको बीजेपी का टिकट मिलना लाजमी है। वैसे बीजेपी नेतृत्व भी उनके बगावती तेवरों से नाराज बताया जाता है। यदि बीजेपी आलाकमान इंद्रजीत का टिकट काटने की हिमाकत करता है तो राव साहब के लिए इनेलो के नेता पहले से ही पलख पांवड़े बिछाए बैठे हैं। कांग्रेस भी उन्हें अपने पाले में खींच कर बीजेपी के लिए मुश्किल पैदा करने की रणनीति पर विचार कर सकती है। ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए अपनी पुरानी एमपी श्रीमती सुधा यादव पर दांव लगाने या राव नरबीर सिंह को आजमाने के सिवाए और कोई चारा नहीं बचेगा।

इनेलो नेता भी इस बार बीएसपी के साथ गठबंधन करके काफी हौंसले में हैं। इनेलो ने यदि अपने पिछले “पहलवान” जाकिर हुसैन को फिर से चुनावी जंग में उतारने का निर्णय लिया तो ‘हाथी’ की ताकत से जाकिर हुसैन चुनावी समर को काफी रोचक बना सकते हैं। यदि कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ और जैसी कि चर्चाएं है अगर इंद्रजीत बीजेपी के ‘फूल’ को फैंक कर हरा ‘चश्मा’ पहन लेते है तो बीजेपी का ‘कमल’ यहां मुरझा जाएगा और कांग्रेस के ‘हाथ’ की पकड़ भी ढ़िली पड़ जाएगी। कांग्रेस की हालत इस क्षेत्र में फिलहाल काफी पतली नजर आती है। राव धर्मपाल क्षेत्र में कोई खास सक्रिय नहीं हैं। जबकि पूर्व मंत्री कैप्टन अजय सिंह यादव यहां से अपने परिवार के लिए कांग्रेस का टिकट हासिल करने के जुगाड़ में लगे हैं।

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