संपादकीय

क्या हाई प्रोफाइल मामले की सुनवाई न हो इसलिए वर्मा को भेजा था छुट्टी पर!

आईना

उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई के निदेशक आलोक कुमार वर्मा को छुट्टी पर भेजने के केंद्रीय सतर्कता आयोग एवं कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के आदेश को मंगलवार को निरस्त कर दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ की पीठ ने वर्मा को सीबीआई निदेशक का कार्य पुन: सौंपने का आदेश दिया है। पीठ ने हालांकि वर्मा को फिलहाल नीतिगत फैसलों से दूर रहने का आदेश दिया। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस अलोक वर्मा को मोदी सरकार ने स्वयं सीबीआई चीफ नियुक्त किया था उन्हें उनके कार्यकाल के समाप्त होने के चार महीने पहले क्यों जबरन अवकाश पर भेज दिया गया ? क्या इसके पीछे दो शीर्ष अफसरों की लड़ाई है या मामला कुछ ज्यादा गहरा है।

सवाल है कि क्या केंद्र सरकार को सीबीआइ निदेशक आलोक कुमार वर्मा की सरकार के प्रति ‘वफादारी’ पर शक हो गया था कि वे संवेदनशील मामलों में ऐसे निर्णय ले सकते हैं जिससे मोदी सरकार की छवि पर गंभीर धक्का लग सकता था और इसलिए सीबीआइ में स्पेशल डायरेक्टर के रूप में राकेश अस्थाना के माध्यम से अलोक वर्मा पर सीधी नज़र रखी जा रही थी। लेकिन जब विवाद अनियंत्रित होने लगा और वर्मा तथा विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग सार्वजनिक हो गयी तो सरकार ने पिछले साल 23 अक्टूबर को दोनों अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेज दिया था। दोनों अधिकारियों ने माेइन कुरैशी के मामले की जांच को लेकर एक दूसरे पर रिश्वतखोरी के आरोप लगाए थे।

गौरतलब है की सीबीआई के समक्ष लंबित संवेदनशील मामलों में राफेल सौदे की शिकायत वाली फाइल आलोक वर्मा के पास है। इस सौदे को लेकर कांग्रेस मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। आलोक वर्मा को चार अक्‍टूबर को भाजपा नेता यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने 132 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी थी तथा जांच की मांग की थी। इन तीनों से मिलने पर मोदी सरकार अप्रसन्न थी। माना जा रहा है कि बहाली के बाद वर्मा राफेल की फाइल से खेल कर सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वर्मा लोकसभा चुनाव से पहले धमाका कर सकते हैं।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया केस का मामला बहुत गंभीर है और इसके छींटे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा तथा संघ के नजदीकी एक पत्रकार पर पड़े थे। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में भ्रष्टाचार का मामला भी आलोक वर्मा देख रहे हैं। इसकी फाइल भी इनके पास है। इस मामले में कई उच्‍च स्‍तरीय लोग जुड़े हैं। इस भ्रष्‍टाचार में इन लोगों की भूमिका की जांच चल रही थी। इसमें उड़ीसा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दुसी का भी नाम शामिल है जो जमानत पर छूटे हुए हैं। कुद्दुसी के खिलाफ चार्जशीट तैयार है और उन पर आलोक वर्मा के दस्तख़त होने बाकी थे।

इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के न्यायाधीश एसएन शुक्ला का नाम भी इस मामले में सामने आया था। उन्हें मेडिकल सीटों पर ऐडमिशन में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते छुट्टी पर भेज दिया गया था। इस मामले में प्राथमिक जांच पूरी कर ली गई थी और सिर्फ़ आलोक वर्मा के हस्ताक्षर की ज़रूरत थी। न्यायाधीश एसएन शुक्ला से सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर काम वापस ले लिया गया है।आलोक वर्मा के समक्ष एक और मामले में भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के सीबीआई को सौंपे वो दस्तावेज़ शामिल हैं जिनमें उन्होंने वित्त एवं राजस्व सचिव हंसमुख अधिया के ख़िलाफ़ शिकायत की है। कोयले की खदानों का आवंटन मामले की फाइल भी आलोक वर्मा के दफ्तर में है।

कोयले की खदानों के आवंटन मामले में प्रधानमंत्री के सचिव आईएएस अधिकारी भास्कर खुलबे की संदिग्ध भूमिका की सीबीआई जांच की जा रही थी। इसके आलावा नौकरी के लिए नेताओं और अधिकारियों को रिश्वत देने के संदेह में दिल्ली आधारित एक बिचौलिए के घर पर छापा मारा गया था। इस मामले की भी जांच चल रही है। इसमें संदेसरा और स्टर्लिंग बायोटेक मामला बहुत महत्वपूर्ण है। संदेसरा और स्टर्लिंग बायोटेक के मामले की जांच पूरी होनी वाली थी। इसमें सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की कथित भूमिका की जांच की जा रही थी। करीब एक साल से सीबीआइ निदेशक और विशेष निदेशक के बीच विवाद चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद पर बहाल किए जाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को केंद्र सरकार पर जोरदार निशाना साधने का मौका मिल गया है। राहुल ने दावा किया है कि सीबीआई प्रमुख को रात एक बजे हटाया गया था क्योंकि वह राफेल मामले की जांच शुरू करने वाले थे। अब न्यायालय के फैसले से हमें कुछ राहत मिली है। अब देखते हैं कि आगे क्या होता है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ‘’सीबीआई प्रमुख बहाल हो गए हैं। वे (प्रधानमंत्री) इस मामले की जांच से भाग नहीं सकते। यह असंभव है। मोदी जी चर्चा से भाग गए। उन्हें राफेल मुद्दे पर जनता की अदालत में हमसे चर्चा करनी चाहिए थी। उन्हें राफेल मामले की जांच से नहीं बचा सकते।

वह कोई भी चर्चा से भाग नहीं सकते। बता दें कि कोर्ट के आदेश के बाद कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। कांग्रेस ने कहा कि नरेंद्र मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिनके अवैध आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया है। कांग्रेस के साथ दूसरे राजनीतिक दलों ने भी शीर्ष कोर्ट के आदेश को सरकार के लिये बड़ा झटका करार दिया। वही कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “प्रधानमंत्री सीबीआई को तबाह करने के मामले में उच्चतम न्यायालय के सामने बेनकाब होने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं। इससे पहले भी उन्होंने इसी तरह केंद्रीय सतर्कता आयोग की विश्वसनीयता (उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायधीश की सलाह की जरूरत) को दरकिनार कर उसे तबाह कर दिया था।

मोदी अब ऐसे पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं जिनके अवैध आदेशों को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया है।” उन्होंने मोदी को यह याद रखने के लिये कहा कि सरकारें आती जाती रहेंगी लेकिन संस्थानों की अखंडता हमेशा कायम रहती है। सुरजेवाला ने ट्वीट किया, “यह आपके लिये हमारे लोकतंत्र और संविधान की मजबूती के बारे में एक सबक है। इससे पता चलता है कि आप कितने भी स्वेच्छाचारी हों, अंत में कानून आपको पकड़ ही लेता है।” सुरजेवाला ने प्रधानमंत्री को ‘लोकतांत्रिक संस्थानों को कुचलने वाला करार दिया। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी अदालत के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने संसद के बाहर पत्रकारों से कहा कि आज आप लोगों पर दबाव बनाने के लिये इन एजेंसियों का इस्तेमाल करेंगे, कल कोई और ऐसा करेगा। ऐसे में लोकतंत्र का क्या होगा? वहीं माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि अदालत के फैसले से साबित होता है कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार इस मामले में सीधे तौर पर शामिल थे।

वही राष्ट्रीय जनता दल सांसद मनोज झा ने इस फैसले को सरकार के मुंह पर करारा तमाचा बताया। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह आदेश इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी को सीधे दोषी ठहराता है। आम आदमी पार्टी प्रमुख ने ट्वीटर पर लिखा, “उच्चतम न्यायालय का सीबीआई प्रमुख को बहाल करना प्रधानमंत्री को सीधे तौर पर दोषी ठहराता है। मोदी सरकार ने देश के संस्थानों और लोकतंत्र को तबाह कर दिया। क्या सीबीआई निदेशक को आधी रात को अवैध रूप से हटाना राफेल घोटाले की जांच रोकने की कोशिश नहीं थी, जिससे सीधे प्रधानमंत्री जुड़े हुए हैं?”

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार को अब अपने राजनीतिक फायदे के लिये सीबीआई और एनआईए जैसी जांच एजेंसियों का दुरुपयोग बंद कर देना चाहिेये। उच्चतम न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यह आदेश वर्मा के लिये अधूरी जीत है।
उन्होंने कहा, उन्हें (वर्मा को) बहाल तो कर दिया गया है लेकिन उन्हें कोई भी नीतिगत फैसला लेने से रोक दिया गया है। बता दें कि अपने आदेश में अदालत ने कहा कि वर्मा के बारे में कोई भी फैसला सीबीआई निदेशक का चुनाव और नियुक्त करने वाली उच्च शक्ति प्राप्त समिति करेगी। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति एस के कौल और के एम जोसेफ की पीठ ने सुनाया है। सीबीआई के निदेशक के रूप में वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी को खत्म हो रहा है।

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