टुडे न्यूज़संपादकीय

कुछ तो सीखो इन नन्हें हाथो के जोश से जनाब!

Hisar Today

आज जब वोट मांगने की बात हो तो नेता कहते हैं हमें वोट दो हम आपके शहर की तस्वीर ही बदल देंगे। मगर इन दिनों सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है मेरे शहर का। मेरे शहर का जिस पर मुझे गर्व है। खुशी होती है कि जब एक तरफ नेता लोग अपने प्रचार में व्यस्त रहते हैं तो ठीक दूसरी तरफ इस चुनावी घमासान के बीच छोटे-छोटे बच्चे पहुंच गए अपने शहर को खूबसूरत बनाने। नन्ही सी बच्ची हाथों में डस्टर लिए अपने शहर की उन बदरंग दीवारों को रंग रही थी, जिसको बदसूरत करने वाले इसी शहर के कुछ लोग हैं। दिवार देखी नहीं कि इसे इश्तिहार का सामान बना लेते हैं और अपने शहर की खूबसूरती पर अपने इंस्टिट्यूट या पार्टी के पोस्टर लगाकर उसे बदनुमा दाग लगा देते हैं।
ऐसे लोगों को अब इन नन्हे बच्चों की मेहनत को देखकर कुछ शर्म आनी चाहिए। वैसे यह नन्ही बच्ची फेसबुक में ‘हमारा प्यार-हिसार’ के निश्वार्थ कार्यों को देखकर इस रविवार अपने शहर को खूबसूरत बनाने के लिए सुबह-सुबह घर से निकलकर पहुंच गयी आईजी चौंक के पास। नन्हे से हाथों में डस्टर से लाल रंग का पेंट करके मानो यह कह रही हो कि अगर मुझे छोटी सी बच्ची को समझ आता है कि अपने शहर की खूबसूरती को बरकरार रखना कितना जरुरी है तो क्या बड़े-बड़े अंकल लोगों को यह नहीं समझ आता कि शहर को गन्दा न करंे।
वैसे यह हम हिसारवासियों के लिए गर्व की बात है कि चुनाव के बीच भी एक संस्था ऐसी है जो अपने शहर की दीवारों को चमकाने में लगी है। हर रविवार ‘हमारा प्यार-हिसार’ ग्रुप शहर के उन महत्वपूर्ण स्थलों को चुनती है जहां के दिवार इश्तिहारों और अस्वछता से पटे हुए हैं। सर छोटूराम स्मारक का स्थल हो या मदनलाल धींगड़ा स्मारक हर जगह सफाई और उसकी खूबसूरती बनाने का काम ‘हमारा प्यार-हिसार’ ने बड़ी बखूबी किया है। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि हमारा प्यार हिसार ग्रुप की तरह हमारे छोटे-बड़े और खुद को नेता समझने वाले लोग भी अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। क्योंकि मैंने ऐसा कई बार देखा है कि हमारे इलाके का कूड़ा-करकट से बुरा हाल होता है, मगर हमारे पार्षद निगम पर जिम्मेदारी थोप देते हैं और अपने हाथ खड़े कर लेते हैं, इतना ही नहीं इलाके में कुछ स्थानों में स्ट्रीट लाइट नहीं है यह बात पार्षदों को भी पता रहती है, मगर जब तक कोई उनको जाके न बोले वो काम करते ही नहीं और मानो बोल भी दिया तो काफी फोन करने के बाद भी काम नहीं होता है।
कभी आपने सोचा है कि क्या यह ठीक बर्ताव है। वो कब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। वैसे इनसे बड़े नेताओं का भी हाल कुछ ऐसा ही है। कहने को तो वह शहर का प्रतिनिधित्व करते हैं मगर हकीकत तो यह है कि शहर को बदसूरत करने वालो पर ये मुखिया ध्यान क्यों नहीं देते। क्यों नहीं ऐसे लोगों पर सख्ती करते। जो काम निगम का है आखिर क्यों निगम के अधिकारियों को सख्त किया जाता। आपको पता ही है कि आज हमारे आयुक्त बड़े तेजतर्रार आयुक्त गर्ग आये हैं। खुशनसीबी है कि उन्होंने खुद अपने अधिकारियों के कार्यों का मुआयना करने के लिए शहर के प्रमुख उद्यानों को देखने के लिए निकल पड़े। गए तो उन्होंने हकीकत खुद अपने आंखों से देखी। अधिकारियो को लगाई फटकार। ठीक उसी प्रकार सभी महानुभावों के स्मारकों के स्वछता को बरकरार रखने की जिम्मेदारी किसकी है। जब अधिकारियों से काम नहीं होता तभी तो ऐसे निस्वार्थ भावना से काम करने वाली संस्था को सामने आना पड़ता है।
बता दें कि काश राजनीति में वोट मांगने वाले भी थोड़ा इस बात को समझ लेते। मुझे पता है बड़े पदों के लिए यह चुनाव है तो यह छोटे से प्रयास में हाथ बटाने कैसे आएंगे? वैसे इन दिनों ये उम्मीदवार विभिन्न प्रकार का प्रचार कर रहे हैं।काश उनके प्रचार में सफाई अभियान भी मुख्य मुद्दा होता।

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