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कश-म-कश में रोहिंग्या, कैसे लौटे अपने देश

Hisar Today

हाल में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बयान देते हुए कहा कि भारत ने कभी भी विदेशियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि रोहिंग्या और अन्य अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई मानवाधिकारों के नजरिये से नहीं देखी जानी चाहिए क्योंकि भारत ने कभी भी विदेशियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया है। यह बात उन्होंने समारोह के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में कही, ‘मुझे विश्वास है कि सख़्त कार्रवाई के नाम पर अमानवीय कार्रवाई के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन मेरी यह भी दृढ़ धारणा है कि राष्ट्रीय और सामाजिक हित में उठाए गए क़दमों को मानवाधिकारों के उल्लंघन के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।’ सिंह ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से नहीं देखी जानी चाहिए। उनके प्रति कोई अमानवीय व्यवहार नहीं था। मुझे इस बात से खुशी है कि उच्चतम न्यायालय का हालिया फैसला सात रोहिंग्या (असम से) के निर्वासन के पक्ष में था।’ गृह मंत्री ने कहा कि मानव अधिकारों को उचित परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए क्योंकि मानवाधिकारों का मतलब है कि हर किसी को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है।

उन्होंने कहा कि इस दिशा में, हमारी सरकार ने करोड़ों लोगों के लाभ के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की हैं। रोहिंग्या का दर्द कहे या पीड़ा, जो यह सोच कर दर रही है कि मैं दुबारा अपने देश वापस न जाओ। क्यूंकि यही सोच कर एक महिला बोल पड़ती है कि “एक बार हम वहाँ पहुंच जाएंगे तो फिर हमारा बलात्कार किया जाएगा। हमें भी जला दिया जाएगा। हमारे बच्चों को काट दिया जाएगा। मेरी ससुराल में 10-15 लोग थे, सभी को काट दिया गया। कोई नहीं बचा। हमें फिर वहीं भेजा जा रहा है। हम मुसलमान हैं तो क्या इंसान नहीं हैं?’’ यह सवाल ऐसा है जिसका जवाब सभी के पास होते हुए भी कोई जवाब देना नहीं चाहता। दिल्ली के कालिंदी कुंज स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैंप में रहने वाली मनीरा 15 दिन पहले पति को खो चुकी हैं। अभी उनका मातम पूरा भी नहीं हुआ था कि अब उन्हें म्यांमार वापस भेजे जाने का डर खाए जा रहा है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने चार अक्तूबर को रोहिंग्या मामले में दखल देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद केंद्र सरकार ने सात रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेज दिया।

इन सात लोगों को साल 2012 में गैरकानूनी तरीक़े से सीमापार करके भारत आने के आरोप में फ़ॉरनर्स एक्ट क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया था। पिछले छह साल से इन लोगों को असम की सिलचर सेंट्रल जेल में हिरासत में रखा गया था। इस घटना के बाद भारत में रह रहे लगभग 40,000 रोहिंग्या शरणार्थियों में वापस म्यांमार भेजे जाने का डर फैल गया है। दिल्ली की अलग-अलग बस्तियों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को इस बात का ख़ौफ़ है कि उन्हें कभी भी हिंदुस्तान से निकाला जा सकता है। उनका ये डर इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि इस बीच दिल्ली पुलिस शरणार्थियों को एक फॉर्म दे रही है। रोहिंग्याओं का आरोप है कि उन्हें यह फार्म भरने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्हें लगता है कि फॉर्म के आधार पर जानकारी इकट्ठा करके सरकार उन्हें दोबारा म्यांमार भेजना चाहती है। ये फॉर्म बर्मी और अंग्रेजी भाषा में है। बर्मी भाषा के कारण इन लोगों का खौफ और भी अधिक बढ़ा है। उनका कहना है कि ये फॉर्म म्यांमार एंबेसी की ओर से भरवाया जा रहा है। दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर चिन्मय बिसवाल ने एक न्यूज़ एजेंसी को बताया, कि “वो भारतीय नहीं हैं। बाहर से आए लोग हैं। ऐसे में उनकी पूरी जानकारी तो हम जुटाएंगे।”

दिल्ली के कालिंदी कुंज स्थित कैंप में कुल 235 रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं और श्रम विहार में कुल 359 लोग रहते हैं। इन लोगों को दिल्ली पुलिस की ओर से जो फॉर्म दिया गया है उसमें व्यक्तिगत विवरण और उनकी म्यांमार से जुड़ी जानकारी मांगी जा रही है। मसलन वे म्यांमार के किस गाँव से हैं, उनके घर में कौन-कौन लोग हैं, उनके अभिभावक का पेशा क्या है और उनकी नागरिकता इत्यादि। चार बच्चों की माँ मनीरा अपने चार साल के बेटे की ओर देखते हुए कहती हैं, “उस देश में दोबारा जाकर ना हम बच्चा पढ़ा सकते हैं, ना अपनी जिंदगी बसा सकते हैं, ना रह सकते हैं, ना कमा-खा सकते हैं। 15 दिन पहले मेरा पति मर गया। वहां हालात बहुत बुरे हैं, मेरे माँ-बाप को काट दिया गया है। किसी तरह जान बचा कर यहां आई। हमें फिर उसी जगह भेजा जा रहा है। हमें डर है। हम नहीं जाएंगे।’’

पुलिस के ज़बरन फॉर्म भरवाने के मामले पर वो कहती हैं, “पिछले कुछ दिन से हालात बिगड़ रहे हैं। पुलिस ने एक फॉर्म दिया है। वो इसे ज़बरदस्ती भरने को कह रही है। हमारी बस्ती का ‘जिम्मेदार’ (हर कैंप का वो शख्श जो इनके कानूनी काम को देखता है) कहता है कि ये वापस भेजने का फॉर्म है। मुझे ये फॉर्म नहीं भरना। हमें पुलिस कहती है ‘नहीं भरोगी तो भी जाना पड़ेगा।’’ साल 2012 में ही मेरा घर तोड़ दिया गया था तो अब वहां जाकर क्या करूंगी। वहां पर अब कुछ नहीं है हमारा। मैंने सात दिन पहले फॉर्म भर दिया था क्योंकि पुलिस साफ़ नहीं बताती कि इसमें लिखा क्या है। मुझे कहा गया हमें फ़ॉर्म चाहिए तुम भर दो। अब मुझे पता चला है तो वो फॉर्म पुलिस को वापस नहीं किया है। “उसी कैंप में रह रहीं मरीना की माँ हलीमा खातून हिंदी नहीं बोल सकतीं लेकिन उनके चेहेेेरे की झुर्रियां अपने दुखों की दास्तां बयां करती हैं।वो कहती हैं, “मैं नहीं जाऊंगी। इससे पहले भी बांग्लादेश ने जिन लोगों को म्यांमार सरकार को सौंपा, उन्हें मार दिया गया। हमें वापस नहीं जाना। भारत सरकार हमें यहीं मार दे लेकिन हमें उस देश वापस नहीं लौटना।’’

मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक रोहिंग्या आतंकवादियों ने पिछले साल म्यांमार के रखाइन प्रांत में हुई हिंसा में हिंदू ग्रामीणों का नरसंहार किया था। संस्था ने रोहिंग्या संकट पर एक रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 अगस्त 2017 को रोहिंग्या आतंकियों ने यह नरसंहार किया। इसी दिन रोहिंग्या आतंकियों ने पुलिसनाकों पर हमला किया और देश में संकट फैल गया। जवाबी कार्रवाई में म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या विद्रोहियों के ठिकानों पर छापे मारे, जिसके चलते करीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों को बौद्ध देश म्यांमार से भागना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमार सेना की कार्रवाई को “जातीय हिंसा” करार दिया था। साथ ही सैनिकों और हिंसक भीड़ पर नागरिकों की हत्या और गांवों को जलाने का आरोप लगाया था। लेकिन एमनेस्टी की रिपोर्ट रोहिंग्या मुसलमानों पर भी उत्पीड़न का आरोप लगाती है। इसमें रखाइन के इलाके में हिंदुओं के जनसंहार की बात शामिल है। यह वही इलाका है जहां सेना मीडिया को कब्र में सड़ गई लाशों को निकालने की कार्रवाई दिखाने भी ले गई थी। उस वक्त रोहिंग्या आतंकवादी संगठन, अराकान रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (एआरएसए) ने इन हत्याओं की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था। लेकिन मानवाधिकार संस्था ने अपनी जांच रिपोर्ट में पुष्टि करते हुए कहा है कि इस संगठन ने हिंदुओं को मारा था, जिसमें ज्यादातर बच्चे शामिल थे। ये हत्याएं उत्तरी माउंगदा के गांवों में हुई थी।

संस्था ने इस क्षेत्र के लोगों से की गई बातचीत के हवाले से कहा है कि यहां दर्जनों लोगों की आंखों पर पट्टी बांधकर नकाबपोश लोग और सादे कपड़े में आए रोहिंग्या, हिंदुओं को शहर से बाहर ले गए। 18 साल की राजकुमारी ने एमनेस्टी को बताया, “उन्होंने आदमियों की हत्या कर दी और हमसे कहा कि हम उस ओर न देखें। उन लोगों के पास चाकू थे और लोहे की रॉडें भी।” उसने बताया कि उसने झाड़ियों में छिपकर अपने पिता, भाई और चाचा की हत्या होते हुए देखी थी। संकट से पहले उत्तरी रखाइन मुस्लिम और बौद्ध बहुल इलाका माना जाता था और यहां हिंदु समुदाय अल्पसंख्यक था। माना जाता है हिंदु समुदाय के इन लोगों को ब्रिटिश हुकूमत सस्ती मजदूरी के चलते यहां ले आई थी।

 

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