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करनाल लोकसभा सीट में कांग्रेस और भाजपा में असली चुनावी जंग

Hisar Today

हरियाणा के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित भगवत दयाल शर्मा जैसे ब्राह्मण नेता इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। हरियाणा के चर्चित ‘लाल’ चौधरी भजनलाल भी इस सीट से एक बार चुनाव जीत चुके हैं। इस सीट से जाट उम्मीदवार को सिर्फ एक ही बार चुनाव जीतने का मौका मिला है और वह भी 1978 के उपचुनाव में। चौधरी देवीलाल के बड़े भाई स्व. साहब राम के दामाद महेंद्र सिंह लाठर तब यहां से सांसद चुने गये थे। वैसे कांग्रेस और बीजेपी (पहले जनसंघ) के उम्मीदवार ही यहां से जीत का सेहरा बंधवाते रहे हैं।

जातीय समीकरणों के हिसाब से करनाल लोकसभा सीट के तहत जाट मतदाताओं की संख्या लगभग दो लाख हैं। अगर 85,000 जट सिक्खों को भी इनके साथ शामिल कर लिया जाए तो ये काफी बेहतर संख्या कही जा सकती है। पंजाबी वोटरों की संख्या भी यहां अच्छी खासी है और वे 1,69,000 हैं। इनके अलावा रोड़ 1,06,361, जाटव 1,36,000, राजपूत 75,000, बनिया 62,000, गुर्जर 57,000 और झीमर 80,000 हैं। अन्य समुदायों के लोग भी काफी तादाद में हैं पर बड़ी तादाद वाली जातियां यही हैं। जहां तक 2019 के चुनावों का सवाल है, पिछली बार करनाल से जीत का डंका बजाने वाले बीजेपी के मौजूदा सांसद पत्रकार अश्विनी कुमार चोपड़ा फिलहाल बगावती मूड में दिखाई पड़ रहे हैं।

अश्विनी कुमार जो खुद पत्रकार हैं पहले अपने अखबार ‘पंजाब केसरी’ के दिल्ली संस्करण में अक्सर बीजेपी और मोदी की महिमा मंडित करते हुए लेख लिखते थे, परन्तु आज उसकी जगह अपने संपादकीय लेखों में वह मोदी व बीजेपी की कटु आलोचना करते दिखाई देते है। जिसको लेकर ऐसा माना जा रहा है कि इस बार बीजेपी आलाकमान अश्विनी कुमार का टिकट काटने का निर्णय ले सकता हैं। ऐसी स्थिति में बीजेपी को इस बार कोई नया चेहरा ढ़ंढ़ना पड़ेगा।

कांग्रेस के पास करनाल में लोकसभा के लिए कई उम्मीदवार हैं। इस क्षेत्र से लगातार दो बार सांसद रह चुके ब्राह्मण नेता अरविंद शर्मा की दावेदारी काफी मजबूत मानी जाती है। वैसे इस क्षेत्र का संसद में चार बार प्रतिनिधित्व कर चुके पंडित चिरंजी लाल शर्मा के बेटे विधायक कुलदीप शर्मा भी एक मजबूत विकल्प माने जा सकते हैं। कुलदीप शर्मा कांग्रेस के भूपेंद्र हुड्डा खेमे के एक मजबूत स्तंभ हैं। अगर हुड्डा की चली तो वे कुलदीप के लिए पूरा जोर लगाएंगे।

वैसे कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर भी अपने खेमे के दो लोगों को यहां से टिकट दिलाने का वादा कर चुके हैं परंतु अंतत: टिकट किसे मिलेगा, इस पर आखिरी मुहर तो कांग्रेस आलाकमान ही लगायेगा। वैसे यहां से भजनलाल के दूसरे बेटे पूर्व उप मुख्यमंत्री चंद्रमोहन बिश्नोई भी टिकट के दावेदार बताए जाते हैं। इस दफा यहां कांग्रेस मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ रही है, जबकि बीजेपी की हालत पिछली बार की तुलना में बेहतर नहीं।

जहां तक इनेलो का सवाल है तो इस बार इनेलो यह सीट खुद न लड़कर अपनी गठबंधन सहयोगी बहुजन समाज पार्टी के लिए छोड़ सकता है। यहां से बसपा के उम्मीदवार मराठा वीरेंद्र ने पिछली दफा एक लाख से अधिक और 2009 में अढाई लाख के करीब वोट लेकर बेहतरीन प्रदर्शन किया था। इस हिसाब से बसपा का इस सीट पर मजबूत दावा बनता भी है। यदि बसपा के वोट बैंक को इनेलो के जनाधार का सहारा मिल जाता है तो तिकोने मुकाबले में बसपा+ इनेलो गठबंधन यहां पर कोई भी नए नतीजे लेकर आ सकते है।

अब देखना यह होगा कि यह सीट बसपा के खाते में जाती है या इनेलो के। यदि बसपा ने अपने पुराने चेहरे मराठा वीरेंद्र पर ही फिर से दांव लगाया तो कांग्रेस व बीजेपी को काफी मेहनत करनी पड़ेगी।जहां तक आम आदमी पार्टी का सवाल है तो, वह यहां कोई बहुत उम्दा स्थिति में नहीं है। पिछली बार आप के उम्मीदवार परमजीत ने पहले ही दांव में अच्छे खासे वोट ले कर बेहतर आगाज किया था, लेकिन आप फिलहाल यहां जीतने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं है।

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