संपादकीय

Hisar Today :-ऐ मेरे वतन,चला गया तेरा रतन

डां ललित,Hisar Today

इतिहास के पन्नों पर जब भी किसी लेखक की लेखनी दिमाग की जगह दिलों के जजबातों को लिखने की पहल करेगी उस दिन पहला नाम भारतीय राजनीति के शिखर पुरूष भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी का लिखा जाएगा। वह गौरव अटल जी का नहीं बल्की खुद इतिहास का होगा।

अटल जी राजनीति के वह वट वृक्ष थे जिसकी छत्रछाया में न जाने कितने पक्ष और विपक्ष के राजनेता पल्लवित पुष्पित और फलित हुए। संसद के अन्दर और बाहर गूंजते उनके हर शब्द भावी राजनीतिज्ञों के लिए प्रेरणादायक प्रसंग रहे। 25 दिसम्बर 1924 को मध्यम प्रदेश के ग्वलियर शहर में जन्म लेने वाला एक नन्हा सा मसीहा भारतीय राजनीति के सिंहासन पर सैद्धांतिक नेता रूप में एक छत्र राज्य करेगा ये किसी ने सोचा भी नहीं होगा।

विद्यार्थी काल से ही राजनीति को अपना मार्ग बनाने वाला वह युवा इतना लोकप्रिय हो गया कि उससे पहले की पीढ़ी के राजनेता भी इस कर्मठ योद्धा से स्वयं को बौना मानने लग गए थे। कृष्ण और कृष्णा (श्रीकृष्ण बिहारी वाजपेयी एवं श्रीमती कृष्णा वाजपेयी) का ये होनहार लाल बचपन से ही अपनी तार्किक शाक्ति एवं काव्य प्रतिभा से सबके आकर्षण का केन्द्र था। राजनीति शास्त्र से प्रथम श्रेणी में एमए कर अपनी योग्यता का परिचय देने वाले श्री अटल जी कनून की पढ़ाई बीच मेें ही छोड़ पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में लीन हो गए।

भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य से लेकर आपात काल की जेल जनता पार्टी में विदेश मंत्री और फिर भारतीय जनता पार्टी के नेत्रत्व में प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने में कठिन अवरोधों का सामना करते हुए भी उन्होने कभी भी अपने सिद्धांतों की बलि नहीं चढऩे दी। 1957 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू ने वाजपेयी जी का परिचय करवाते हुए कहा था यह युवा आज मेरा सबसे बड़ा आलोचक है परन्तु मैं इसमें भारत का भविष्य देख रहा हूं और यह एक दिन भारत के प्रधानमंत्री बनेगा।

राजनेता के रूप में वाजपेयी जी की पहचान सम्पूर्ण विश्व के राजनीतिक पटल पर चलचित्र की मानिन्द युगों तक चलती रहेगी और आने वाली पीढिय़ां उनके महान विचारों से प्रेरणा लेकर राजनीतिक शास्त्र के मापदंड तय करते रहेंगे। राजनेता के अलावा हम उनमें एक महान रचनाकार को देखते हैं,हमने उस रचनाकार को शब्दों में उतरते और ढलते देखा तो अंतर मन में एक विशेष अनुभूति हुई कि श्री वाजपेयी साहित्य और काव्य की एक विधा ही नहीं अपितु वह कलकारखाना हैं जहां हर पल नवश्रृजन होता है। आज उनके काव्य सग्रह को पढ़ा जाए तो आप को वाजपेयी जी को किसी से भी जानने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सिद्धान्तों की कसौटी पर कितनी मजबूती से आरूढ थे कदम कदम पर उन्होने ने इसका प्रमाण दिया। अपने प्रधानमंत्रित्व के काल मे जब उन्होने गठबंधन की मजबूरियों के चलते कुछ समझौते करने पड़े तो एक कवि हृदय चित्कार उठा।

मैं बूढ़ा बेबस और लाचार हो गया हूं,

गहराई से मंथन करो तो कितना दर्द छुपा है वाजपेयी जी के इन तीन शब्दों में। वाजपेयी जी का गौरव कभी पद से नहीं जोड़ा जा सकता बल्की वह पद ही गौरवमय हो जाता था जिसपर आदर्शो और सिद्धान्तों की राजनीति करने वाला यह महान पुरोधा विराजमान होता था। जब जब भी भारत की राजनीति मेें आदर्शो और संस्कारों की सांस्कृतिक पताका फहराई जाएगी तब तब श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी लोगों के दिलों में धडक़े दिखाई देंगे।

अंत में वाजपेयी जी के लिए मुझे एक शायर की दो पंक्तियां याद आ रही है जो सार्थक हो रहीं हैं………….

खुदी को कर इतना बुलन्द की ऐ बंदे

खुदा भी तेरी तकदीर के लिखने से पहले

पूछे कि बता तेरी रज़ा क्या है।।

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