राजनीतिसंपादकीय

उमा भारती “मी टू” के जरिये उठा रही है गंगा की सफाई का मुद्दा

Hisar Today

केंद्र में नई सरकार बनने के बाद 2016 को गंगा सफाई मंत्री उमा भारती ने दावा किया था कि उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी गंगा की सफाई और 2018 में गंगा साफ दिखाई देगी। अब चार साल बीत चुके हैं। अब सरकार की ओर से गंगा स्वच्छता पखवाड़ा आयोजित किया जा रहा है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार सबसे पहले यह बताती कि उसके वादों का क्या हुआ और चार साल गुजर जाने के बाद भी आखिर कितनी साफ हुई। इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की जाएगी, तो लोगों को शायद ही कुछ मिल पाए। वैसे कहा जाता है कि उमा भारती के नमामि गंगा मुहिम की विफलता के चलते यह विभाग उनके पास से छीन कर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को दे दिया गया था। मगर अपनी विफलताओं पर पछताने की बजाय हाल में वह भी “मी टू” मुहीम में टूट पड़ी।

हाल में केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा और यमुना की सफाई का मिशन पूरा होने के बाद देश-दुनिया की अन्य नदियां भी ‘मी टू’ का आह्वान करेंगी। उन्होंने पत्रकारों से यह भी कहा कि नदी और महिलाओं के आगे बढ़ने में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। गंगा के लिए न्यूनतम प्रवाह, जिसे उसके रास्ते में विभिन्न स्थानों पर बनाये रखना है, पर एक सरकारी अधिसूचना का जिक्र करते हुए भारती ने कहा कि जब तक दुनिया के सबसे बड़े जलाशयों में से एक इस नदी की समस्याएं समझी नहीं जातीं, उसकी दुश्वारियों का निवारण नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा, ‘नदियों को बचाने के लिए देश में यह एक अहम परिघटना है। यह गंगा और यमुना से शुरू होगी और तब देश और विदेश की अन्य नदियां भी ‘मी टू’ का आह्वान देंगी यानी मेरे लिए भी आंदोलन शुरू करो।’

उन्होंने कहा, ‘नितिन (गडकरी) जी ने यह कार्यक्रम शुरु किया है और सभी नदियां ‘मी टू’ कहने लगेंगी। हम भी ऐसी ही अधिसूचना चाहते हैं। नदी और महिलाओं के आगे बढ़ने में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। यही संकल्प आज लिया जा रहा है।’ इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे। विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर के ‘मी टू’ अभियान में घिर जाने के बारे में पूछे जाने पर गडकरी ने कोई जवाब नहीं दिया। बता दे की इन दिनों सोशल मीडिया में बढ़ चढ़कर ‘मी टू’ आंदोलन चल रहा है, जिसमें यौन उत्पीड़न और यौन हिंसा के खिलाफ एक अभियान सोशल मीडिया पर फैला हुआ है।

जिस प्रकार उमा भारती “मी टू” अभियान के तहत बयान बाजी कर रही है, काश वो गंगा सफाई में कुछ कर पाती जब वह इस खाते का पदभार संभाल रही थी। बता दें कि गंगा को साफ रखने के लिए नमामि गंगे परियोजना के तहत 1500 करोड़ में से उत्तराखंड में 250 करोड़ की लागत की 43 योजनाओं का शिलान्यास किया गया था। इस परियोजना के तहत उत्तराखंड के उत्तरकाशी, गंगोत्री, यमुनोत्री, श्रीनगर, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, केदारनाथ, बदरीनाथ में गंगा सफाई के लिए काम होना था। इस मौके पर केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा सफाई मंत्री उमा भारती ने दावा किया कि अक्टूबर 2016 से गंगा सफाई का असर दिखाई देगा। वर्ष 2018 तक गंगा पूरी तरह से साफ हो जाएगी।

वैसे नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय, भारत सरकर के स्वच्छ गंगा मिशन के बहाने यह बताने की कोशिश कर रही है कि वह गंगा की सफाई के काम में लगी हुई है। लेकिन बीते करीब चार वर्षों में गंगा सफाई के लिए किए गए कार्यों के बारे में कोई उत्साहवर्धक जानकारी नहीं मिल पाई है। प्रधानमंत्री से लेकर गंगा सफाई मंत्री तक के लंबे-चौड़े वादों के अलावा शायद ही कुछ ऐसा मिले जिससे पता चले कि वाकई इस दिशा में कुछ किया गया है। गंगा सफाई परियोजनाओं की असफलताओं को लेकर लंबे समय से आलोचना ही देखने-सुनने में ज्यादा आती रही है।2014 में केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बनने के बाद लोगों में यह उम्मीद जगाने की कोशिश की गई थी कि गंगा का उद्धार होने वाला है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नमामि गंगे मिशन की शुरुआत बड़े जोर-शोर से की थी। तब गंगा सफाई मंत्री बनी उमा भारती ने भी सबको विश्वास दिलाने की कोशिश की थी कि गंगा जरूर साफ कर दी जाएगी। इस दौरान उमा भारती से यह मंत्रालय भी छीन लिया गया। बीच-बीच में इस तरह के पखवाड़ों और यात्राओं का आयोजन अवश्य किया गया, जिनसे गंगा की सफाई तो नहीं हुई, प्रचार भले ही भरपूर मिला हो।

गंगा सफाई के बारे में सरकार की असफलताओं को लेकर अगर केवल दो बातों को गौर से देखा जाए, तो पता चल जाता है कि सरकार गंगा सफाई के बारे में गंभीर नहीं है। सरकार का ध्यान गंगा की सफाई से कहीं ज्यादा इसके प्रचार और जनता के पैसे के अपव्यय पर है। सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट की ओर से सरकार से पूछे गए तीखे सवाल हैं जिनका कोई सटीक जवाब भी सरकार नहीं दे सकी थी। सितंबर 2014 में ही सुप्रीम कोर्ट ने गंगा की सफाई पर अपेक्षित ध्यान न देने पर केंद्र सरकार की जमकर आलोचना की थी। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा था कि ऐसे तो गंगा की सफाई में दो सौ साल लग जाएंगे। तब क्या आने वाली पीढ़ियां गंगा को कभी उसकी पुरानी गरिमा के साथ देख पाएंगी? सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि वह गंगा को उसी गौरवपूर्ण रूप में वापस लाए। इस आशय की तल्ख टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से गंगा सफाई पर दिए गए हलफनामे पर की थी।

यह ध्यान में रखने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट में गंगा की सफाई से संबंधित मामला 1985 से चल रहा है। फिलहाल ऐसी स्थिति तब है जब केंद्र में एनडीए की सरकार है और वह खुद को गंगा की सफाई को लेकर प्रतिबद्ध बताती है। बीजेपी तो अपने चुनावी घोषणापत्र में भी गंगा की सफाई के प्रति प्रतिबद्धता जता चुकी है। इसके बाद सन 2015 में इस सरकार ने फिर सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि गंगा की सफाई इसी कार्यकाल में पूरी हो जाएगी। केंद्र सरकार 2018 तक यह महत्वाकांक्षी परियोजना पूरी कर लेगी। अब तो 2018 भी आ गया, और जल्द 2019 भी आ जायेगा लेकिन गंगा वैसी ही रह गई जैसी पहले थी या उससे भी ज्यादा गंदी हो गई।

इसके अतिरिक्त नमामि गंगे के लिए आवंटित धन और उसके खर्च को लेकर भी चौंकाने वाली जानकारी आ चुकी है। इससे पता चलता है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर करीब चार सालों में क्या-क्या किया गया। जून 2017 में आरटीआई के माध्यम से मिली एक जानकारी के अनुसार, बीते तीन साल में बजट में जारी 5378 करोड़ रुपये में से केवल 3633 करोड़ रुपये ही निकाले गए और केवल 1836 करोड़ 40 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके। मतलब साफ है कि अभी तक जारी बजट का आधा धन भी खर्च नहीं किया जा सका है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसमें से भी सफाई पर कितना खर्च किया गया होगा। संभव है, इसका अधिकाधिक हिस्सा इसी तरह के पखवाड़ों और यात्राओं पर खर्च किया गया हो।

अब इस सरकार का कार्यकाल एक साल से भी कम का बचा है। जब गंगा सफाई के परिणाम सामने आने चाहिए थे, तब सरकार परिणाम की जगह पखवाड़ा का आयोजन कर रही है। मतलब साफ है कि अपने वादों और दावों को सरकार पूरी तरह भुला चुकी है। गंगा की सफाई उसका मकसद है ही नहीं। इस तरह इस परियोजना का हश्र भी वही होता दिख रहा है जैसा इस सरकार की बाकी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का हो रहा है। साफ है कि वादे करने में चाहे जितनी भी आगे रही हो, वादे पूरे करने के मामले में मौजूदा सरकार का प्रदर्शन निराशाजनक ही कहलाएगा। गंगा को निर्मल बनाने वाली ‘नमामि गंगे परियोजना’ भी सरकार की विफलता की ही कहानी कह रही है। यही कारण है कि इस सरकार से आमजन का बहुत तेजी से मोहभंग हो रहा है।

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