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‘ईशनिंदा कानून’ व धार्मिक ग्रंथों का अपमान

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आजादी पर्व 15 अगस्त को जब पूरे देश में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा था। देश की राजधानी दिल्ली में ऐतिहासिक इंडिया गेट के सामने दो युवक अलग-अलग धार्मिक पुस्तकें और भारत के संविधान की प्रति जलाने का दुस्साहस कर बैठे। इस घटना का वीडियो बना और वायरल भी हुआ। वायरल हुए वीडियो की मदद से पुलिस दोनों युवकों तक पहुचने में कामयाब रही। फिलहाल दोनों युवक हवालात की हवा खा रहे हैं। इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में दलित समुदाय के लोगों ने हिंदू धार्मिक ग्रंथ जलाकर विरोध प्रदर्शन किया। यहां कई हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों का भी दाह संस्कार किया गया। इस तरह की घटनाएं देश में धार्मिक और जातीय घृणा की दरार को और चौड़ा करती हैं।

सामुदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण पाना राज्य सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए देश में कानूनी प्रावधान भी हैं। आईपीसी की धारा 295A के तहत किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर भारतीय नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से लिखित रूप से, चित्र, संकेतों या किसी अन्य माध्यम से उसके धार्मिक विश्वास का अपमान करने पर उसे आरोपी बनाया जा सकता है। सदियों पुराने इस कानून की अपनी कमियां भी हैं। यह कानून अवमानना और आलोचना में फर्क को स्पष्टता से परिभाषित नहीं करता। जिस वजह से कई लोग इस कानून का शिकार हुए हैं। आईपीसी की धारा 295A के तहत आरोप सिद्ध होने पर तीन साल के लिए कारावास या जुर्माना या दोनों रूप में दंड भुगतना पड़ सकता है।

यह अपराध संज्ञेय होता है, मतलब पुलिस बीना वारंट के आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है। एक तरफ जहां पुराने पड़ चुके अप्रसांगिक कानूनों को समाप्त किये जाने की मांग की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार की कैबिनेट ने धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने पर कड़े रुख को अख्तियार करते हुए उम्रकैद की सजा के लिए सीआरपीसी और आईपीसी में संशोधन करने को मंजूरी दे दी है। पिछले तीन सालों के दौरान पंजाब में हुई धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी की घटनाओं की जांच करने वाले रणजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी कुछ मामले अनसुलझे दिखाई दे रहे हैं। इन घटनाओं के सभी आरोपियों के खिलाफ ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ है, किसी को सजा मिलने की खबर भी नहीं आई है।

मगर जिस दिन आयोग की रिपोर्ट पर पंजाब विधानसभा में चर्चा हुई, उसी दिन वहां एक बिल पारित कर भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़ी गई। इस धारा के अनुसार श्री गुरु ग्रंथ साहिब, श्रीमद्भागवत गीता, पवित्र कुरान और पवित्र बाइबल से जुड़ी जनता की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के इरादे से अगर कोई इन्हें नुकसान पहुंचाता है या इनकी बेअदबी करता है, तो उस व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी।

पंजाब विधानसभा में पारित बिल को संविधान के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत, संविधान के अनुच्छेद 19A में अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और मानवाधिकार की कसौटी पर परखने की जरुरत है। साथ ही इस बिल के कानून बनने पर इसके दुरुपयोग और सामाजिक व्यवहार में उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों की परख करना भी जरुरी है। असहमति लोकतंत्र का आधार है। संविधान के अनुच्छेद 19A में अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार दिया गया है। मगर 1927 में भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़कर प्रावधान किया गया था कि यदि कोई जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा या फिर उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान करेगा तो उसे 3 साल तक की सजा हो सकेगी।

अब 2018 में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने चार धर्म ग्रंथों की बेअदबी और उन्हें नुकसान पहुंचाने के अपराध में आजीवन कारावास का प्रावधान करने वाले बिल को पारित कर दिया गया है। भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़े जाने की पृष्ठभूमि में 1927 में प्रकाशित हुई एक पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ है। इसमें पैगम्बर मोहम्मद के जीवन के बारे लिखा गया था। इस पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए प्रकाशक के खिलाफ शिकायत हुई थी और उन्हें िगरफ्तार भी कर लिया गया था। लेकिन अप्रैल,1929 में वो इस आधार पर मुकदमे में बरी हो गए कि धर्म का अपमान करने के खिलाफ कोई कानून नहीं था। बाद में उस प्रकाशक की हत्या कर दी गई और हत्या करने वाले को बड़े सम्मान से नवाजा गया। धार्मिक भावनाओं का अपमान करने वाले को सजा देने के कानून बनाने की मांग उठी जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़ दी।

पंजाब विधानसभा में पारित किए गए बिल के अनुसार धारा 295A जोड़ कर कठोर कानून बनाए जाने को संविधान में दिए गए बोलने की आजादी के मौलिक अधिकार की भावना के विपरीत ही माना जाएगा क्योंकि कोई प्रतिबंध तभी लगाया जा सकता है जब उस समय की परिस्थितियों में उसको लागू करना टाला न जा सके। पंजाब के इस कानून से लगाई गई रोक को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। वैसे भी धारा 295A जहां धार्मिक भावना का अपमान जान-बूझकर, दुर्भावना से करने को अपराध मानती है, वहीं प्रस्तावित धारा 295A धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने की नीयत से की गई बेअदबी को अपराध मान लेती है। अगर पंजाब विधानसभा में पारित किए गए कानून की समीक्षा इसके धर्मनिरपेक्ष होने के नजरिए से की जाए तो एक कानून मात्र इसलिए धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता कि इसमें एक धर्म ग्रंथ की बजाय चार धर्म ग्रंथों को शामिल कर लिया गया है।

इसके दो कारण हैं। पहला, इन चार धर्म ग्रंथों के अलावा भी बौद्ध धर्म और जैन धर्म समेत अनेक धार्मिक संप्रदायों आदि के ग्रंथ भी हैं जिनमें नागरिकों का एक समूह आस्था रखता है। लेकिन उन्हें इस प्रावधान में शामिल नहीं किया गया है। इस कानून का बनना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है। यह सही है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और प्रचार करने की छूट देता है, बशर्ते यह सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अनुरूप हो। दूसरा, जब राज्य का कोई धर्म नहीं है तब ऐसे कानून बनाना जो किसी धर्म को नुक्ताचीनी से बचाने की कोशिश करें, धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने की कोशिश की नहीं बल्कि धार्मिक समूह को खुश रखने की चुनावी राजनीति ही है। पंजाब विधानसभा में पारित बिल में बेअदबी की परिभाषा नहीं दी गई है, इसलिए इस कानून का दुरुपयोग होने के खतरे बढ़ जाते हैं। किसी कानून की अस्पष्टता भी उसको रद्द किए जाने का आधार हो सकती है। सही है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत बोलने की आजादी पर सामाजिक व्यवस्था के हित में तर्कसंगत प्रतिबंध लगाया जा सकता है, लेकिन पंजाब विधानसभा द्वारा पारित बिल किसी नागरिक के बोलने की आजादी पर तर्कसंगत नहीं बल्कि गैरवाजिब प्रतिबंध लगाता है।

इस कानून के तहत यदि कोई वैज्ञानिक समझ को प्रचारित-प्रसारित करने वाला नागरिक, धर्म ग्रंथों के किसी विचार पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सवाल करता है तब भी इसे अपराध करने के मामले में फंसाया जा सकता है। भारत ने संविधान के अनुच्छेद 51(ह) के अनुसार भारत के हर नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवता के आधार पर जांच और सुधार की भावना को विकसित करे। जब कोई नागरिक अपने मौलिक कर्तव्य का पालन करते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित जांच करने की विधि का विकास करेगा तब नए प्रावधान के आधार पर उसे यह कह दिया जाएगा कि अब वह किसी धर्म ग्रंथ की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समीक्षा ना करे क्योंकि इस तरह की समीक्षा से जनता की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना समझा जा सकता है।

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