संपादकीय

आरक्षण से तौबा करने वाली भाजपा अब पका रही है ‘खिचड़ी’

आईना

चुनाव के पहले आरक्षण, हिन्दू मुस्लिम दंगे, राम मंदिर, गौ माता, भारत -पकिस्तान मसला यह सब विषय उठाना तो स्वाभाविक ही है। ऐसे में अगर भाजपा इन मुद्दों को लेकर चुनाव के पूर्व कोई घोषणा करती है तो यह कोई नई बात नही। आखिर ऐसा क्या कारण है कि सरकार को साढ़े चार साल के कार्यकाल के बाद ठीक चुनाव के पहले आरक्षण की याद आई। बता दें कि राम मंदिर के मुद्दे पर जो लोग सक्रिय थे उनमें सवर्णों की संख्या सबसे ज़्यादा थी। इसलिए एक तीर से दो निशाना करने के उपदेश्य से सरकार के इस क़दम से अनुसूचित जाति/ जनजाति के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदलने से सवर्णों में उपजी नाराज़गी काफ़ी हद तक कम होगी। क्योंकि गौरतलब बात है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी। भाजपा सरकार से नाराज़गी के ये दो मुद्दे ख़त्म तो नहीं होंगे पर उनकी धार ज़रूर कुंद हो जाएगी। सवाल है कि यह काम मोदी सरकार पांच राज्यों के चुनाव से पहले भी कर सकती थी।

लेकिन उसने नहीं किया, क्यों? क्योंकि भाजपा नहीं चाहती थी कि इतने बड़े ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल छोटे लक्ष्य के लिए किया जाए। भाजपा चाहती थी कि आज पूरी पार्टी की रणनीति के केंद्र में इस समय सिर्फ़ लोकसभा चुनाव हैं। इसलिए फैसले ऐसे लेने होंगे जिसका असर लोकसभा चुनाव में भाजपा को फायदा पहुंचाने में मदददगार साबित हो। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता इस कारण संविधान संशोधन बिल लाया जा रहा है। नौकरियां कहां हैं, धीरे धीरे जब नौकरी का सवाल बड़ा हो रहा था, ऐसे आंकड़े आ रहे थे कि पिछले साल शहरों और गांवों में एक करोड़ लोगों की नौकरियां चली गई हैं।

ऐसे समय में लोगो का मुंह बंद करवाने और खुद की पार्टी की फजीती होते देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कर लिया है, बल्कि संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन यानी 8 जनवरी को संविधान संशोधन विधेयक भी पेश किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता इस कारण संविधान संशोधन बिल लाया जा रहा है। वैसे मीडिया में खबरें चल रही हैं कि दस फीसदी ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला हुआ है। मगर सामाजिक न्याय राज्य मंत्री विजय सांपला ने कहा है कि इस दस फीसदी में गरीब सवर्णों यानी ब्राह्मण बनिया मुस्लिम और ईसाई भी हैं।

क्या वाकई मोदी सरकार ईसाई और मुसलमानों के गरीब लोगों को इस दस फीसदी में जगह देने जा रही है। हाल में भाजपा जब अनुसूचित जाति के लिए भीम महाभोज का आयोजन कर रही थी, पांच हज़ार किलो खिचड़ी पका रही थी, शायद आयोजकों को भी अंदाज़ा नहीं होगा कि शायद खिचड़ी कुछ और पक रही है। एससी/एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर नाराज़ सवर्णों के कारण मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। इस हार में अनुसूचित जाति और जनजाति की नाराज़गी भी शामिल थी। मगर मीडिया के विश्लेषणों में इसी बात को प्रमुखता से उभारा गया। अगर उनका साथ नहीं मिलता तो 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को प्रचंड सफलता नहीं मिलती।

लेकिन भाजपा समझ गई कि अनुसूचित जाति का मतदाता उससे खिसक रहा है। भीमा कोरेगांव, ऊना और रोहित वेमुला प्रसंगों को राष्ट्रवाद से ढंकने का प्रयास सफल होता नहीं दिखा। इसलिए नागपुर से कड़ाही मंगा कर खिचड़ी बनाई गई। पहली बार भाजपा ने अनुसूचित जाति के लोगों को बुलाकर खिलाया, वर्ना इसके पहले अमित शाह सहित उसके नेता कई महीनों तक अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता और मतदाता के घर जाकर भोजन करते रहे। भोजन के तुरंत बाद फोटो ट्वीट किया करते थे।

यही नहीं 2016 के उज्जैन कुंभ का विवाद याद कीजिए। अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान बाल्मीकि घाट पर अनुसूचित जाति के साधुओं के साथ स्नान करने पहुंच गए। इसका नाम समरसता स्नान दिया गया था, दिल्ली की खिचड़ी का नाम भी समरसता खिचड़ी रखा गया था। रविवार को खिचड़ी खिलाकर सोमवार को मोदी सरकार फैसला करती है कि ग़रीब सवर्णों, ईसाई और मुसलमानों को दस फीसदी का आरक्षण दिया जाएगा। यानी कि भाजपा दरअसल खिचड़ी कुछ और पका रही थी।

1990 के साल में जब वी पी सिंह लेफ्ट और राइट की खींचातानी में फंसे थे, भीतर से देवीलाल की चुनौती का सामाना कर रहे थे तब उन्होंने अगस्त 1990 में मंडल आयोग के सुझावों को स्वीकार कर लिया और लाल किले से इसका एलान कर दिया। इसकी काट खोजने के लिए आडवाणी राम मंदिर बनाने के लिए रथ यात्रा पर निकल गए। नंवबर 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया कि ओबीसी आरक्षण सही है और 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं होना चाहिए। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी जाती है। उसके बाद हुए दंगों में कई लोग मारे जाते हैं।

उस वक्त भी मंडल की बहस ने कमंडल की बहस को पीछे धकेल दिया और भाजपा को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की राजनीति का कोई लाभ नहीं मिला। उसके बाद हुए चुनावों में यूपी सहित कई राज्यों में भाजपा बुरी तरह हार गई। तब से भाजपा बीच चुनाव में राम मंदिर के नाम से किनारा करने लगी और कहने लगी कि जो कोर्ट से फैसला होगा, वही माना जाएगा। इस वक्त संघ के घटकों से राम मंदिर को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा है। क्या मोदी राम मंदिर के दबाव की काट में वी पी सिंह की तरह मोदी भी कदम उठा रहे हैं, या फिर वो आरक्षण और राम मंदिर दोनों के सवाल को एक साथ साधने का प्रयास कर रहे हैं? क्या उनके इस फैसले से आरक्षण विरोधी अब आरक्षण का समर्थन करने लगेंगे? अगर प्रधानमंत्री के तमाम भाषणों को याद करे, तो याद आता है कि उन्होंने ग़रीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने की बात की हो। या इसे प्रमुख एजेंडा बनाया हो। पांच साल तक विकास विकास करते रहने वाले मोदी आखिर में आरक्षण पर क्यों दांव लगाना चाहते हैं।

सितंबर 2018 में अमित शाह साफ-साफ कहते हैं कि 50 परसेंट से अधिक आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता है। 2017 के गुजरात चुनावों में भी यही बात कहते हैं। जनवरी 2019 में अब अमित शाह को कहना पड़ेगा कि 50 परसेंट से अधिक रिज़र्वेशन दिया जा सकता है और उनकी सरकार संविधान संशोधन बिल लाने जा रही है। इसके पहले 1999 में नरसिम्हा राव सरकार ने भी गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात कही थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया। गुजरात में आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को 10 परसेंट आरक्षण दिया गया। जनवरी 2018 में हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक मानते हुए रिजेक्ट कर दिया। हरियाणा में जाट भी मांग रहे थे तो उन्हें क्यों नहीं दिया गया। भाजपा ने यूपी चुनाव में वादा किया था कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण में एमबीसी के लिए अलग आरक्षण करेंगे।

इसके लिए एक कमेटी बनी जिसने दिसंबर 2018 में रिपोर्ट दी कि ओबीसी कोटा के भीतर 7 प्रतिशत आरक्षण यादव और कुर्मी के लिए है, बाकी आरक्षण मोस्ट बैकवर्ड कास्ट को दिया जाए। उस रिपोर्ट का क्या हुआ। क्या वो भी लागू होगा। नही पता। क्या आरएसएस अब इस बात से सहमत होगा, मोहन भागवत ने आरक्षण के लाभों की सामाजिक समीक्षा की बात कही थी, मगर उन्होंने भी जनरल कास्ट, ईसाई और मुसलमानों के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को 10 फीसदी आरक्षण का आइडिया नहीं सोचा था। सबको पता है सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं। 2006 के साल से यूपीए के दौर में मीरा कुमार निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात कर रही थीं। बैठकें वगैरह होती थी मगर कुछ खास नहीं हुआ। नवंबर 2017 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्राइवेट सेक्टर में 50 परसेंट आरक्षण की बात कही थी। उनकी सरकार ने एक फैसला भी किया है कि बिहार में जो भी प्राइवेट कंपनी आउटसोर्सिंग का काम करती है, उसे आरक्षण के प्रावधानों को लागू करना होगा।

प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण के सवाल को क्यों छोड़ दिया गया? नौकरियां सरकारी सेक्टर में कम हैं, ये आरक्षित वर्ग को भी नहीं मिलती हैं और अनारक्षित वर्ग के लिए भी नहीं हैं। आपको याद होगा जाति की जनगणना 2012 में तय हुआ। काफी पैसा खर्च हुआ मगर 2015 में जब रिपोर्ट आई तो जारी ही नहीं किया गया। जाति की जनगणना के आंकड़ों से कौन डरा था। क्यों नहीं सार्वजनिक हुआ। अगर आरक्षण पर ईमानदार बहस करनी ही थी तो उस रिपोर्ट को भी सामने लाना चाहिए। तब नीतीश कुमार ने मोदी सरकार की आलोचना की थी। शरद यादव ने तो निरंतर अभियान चलाया कि जाति की जनगणना की रिपोर्ट जारी की जाए।

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