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आईना:अडाणी को लाभ पहुंचाने के लिए झारखंड सरकार ने बदली ऊर्जा नीति

Hisar Today

सितंबर 2012 में बनी झारखंड सरकार की ऊर्जा नीति अक्टूबर 2016 में बदल दी गई। इस प्रकार के आरोप आज से नहीं बल्कि कई सालों से अडानी और झारखंड सरकार पर लगाए जा रहे है। इसके प्रावधानों में मामूली संशोधन किए गए और रघुवर दास की कैबिनेट ने उस पर मुहर लगा दी। इससे पहले झारखंड की बीजेपी सरकार ने कोई सर्वे नहीं कराया और न किसी विशेषज्ञ कमेटी ने उसे ऐसा करने की सलाह दी। इस संशोधन के महज पंद्रह दिन बाद झारखंड सरकार और अडाणी समूह के बीच सेकेंड लेवल का एमओयू साइन किया गया। इसके तहत अडाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड को गोड्डा में 800-800 मेगावॉट क्षमता के दो सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट बनाने की इजाजत मिल गई ताकि वहां उत्पादित 1600 मेगावॉट बिजली डेडिकेटेड ट्रांसमिशन लाइन के ज़रिए सीधे बांग्लादेश भेजी जा सके। झारखंड सरकार द्वारा 12 सितंबर 2012 को अधिसूचित ऊर्जा नीति का एक प्रावधान अडाणी समूह को ऐसा करने से रोक रहा था।

उसके मुताबिक झारखंड में लगाए जाने वाले किसी भी पावर प्लांट को अपने कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत हिस्सा झारखंड सरकार को बेचना होता। लेकिन, सरकार ने अपनी ऊर्जा नीति में संशोधन कर इसमें ढील दे दी। नए प्रावधानों के मुताबिक, बिजली कंपनियां झारखंड में उत्पादित बिजली के एक चौथाई हिस्से के बराबर बिजली किसी दूसरे पावर प्लांट से भी सप्लाई कर सकती हैं। इसके लिए यहीं पर उत्पादित बिजली को झारखंड को देना अनिवार्य नहीं रह गया। अगर ऊर्जा नीति में संशोधन नहीं किया जाता तो अडाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड को गोड्डा प्लांट में उत्पादित 400 मेगावाट बिजली (1600 मेगावाट का 25 प्रतिशत) झारखंड को देनी होती। तब वह बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड से किए अपने करार की शर्तें पूरी नहीं कर पाता।

बांग्लादेश से हुए करार के मुताबिक गोड्डा में उत्पादित कुल 1600 मेगावाट बिजली एकमुश्त बांग्लादेश को देनी थी। जाहिर है इन संशोधनों का तत्काल फायदा अडाणी समूह को हुआ। क्या अडाणी समूह ने बदलवाई थी ऊर्जा नीति? इस सवाल के जवाब में अडाणी समूह के प्रवक्ता ने एक समाचार एजेंसी से कहा, “गोड्डा में प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए अडाणी समूह ने राज्य सरकार से ऊर्जा नीति में बदलाव करने का कोई अनुरोध नहीं किया है। बिजली की कीमतों के निर्धारण में भी हमारी कोई भूमिका नहीं है। भारत-बांग्लादेश के प्रधानमंत्री की सहमति से हुए समझौते के मुताबिक बांग्लादेश को 1600 मेगावॉट बिजली देने का प्रावधान किया गया है।”

संसदीय कार्य मंत्री सरयू राय ने भी विधानसभा में इस बारे में कहा कि ऊर्जा नीति में संशोधन बांग्लादेश से हमारे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मद्देनजर किया गया। उनके मुताबिक, “सरकार की मंशा किसी कॉरपोरेट समूह को लाभ पहुंचाने की नहीं रही है। हमें अडाणी समूह से बिजली की जो मात्रा मिलनी चाहिए, वही मिलेगी। फर्क सिर्फ इतना है कि वह 400 मेगावाट बिजली अडाणी समूह राज्य के बाहर स्थित अपने प्लांट से देगा। हमने ऊर्जा नीति में संशोधन किया है। उसे बदला नहीं गया है। पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार ने अपनी ऊर्जा नीति अडाणी समूह को फायदा पहुंचाने के लिए बदल दी है।” सरकार ने कई स्तरों पर गड़बड़ी की। न केवल ऊर्जा नीति बदली बल्कि जमीन की कीमत के निर्धारण, जनसुनवाई और पर्यावरण सुनवाई में भी फर्जीवाड़ा किया गया।”बाबूलाल मरांडी ने समाचार एजेंसी से यह भी कहा, कि “एनटीपीसी, डीवीसी (दामोदर घाटी निगम) और नेशनल ग्रिड से तो सरकार बिजली खरीदती ही है। अडाणी समूह के झारखंड से बाहर स्थित प्लांट से 400 मेगावॉट बिजली खरीदने से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा।”

उन्होंने कहा, “साल 2012 की ऊर्जा नीति के मुताबिक़ पावर कंपनियों को कुल उत्पादन के 25 फीसदी हिस्से का सिर्फ 12 फीसदी वेरियेबल कॉस्ट पर देना होता है। शेष 13 प्रतिशत बिजली की कीमत फिक्स्ड और वेरियेबल दोनों खर्चों को ध्यान में रखकर तय की जाती है। अब पावर कंपनियां समूची 25 फीसदी बिजली फिक्स्ड और वेरियेबल दोनों खर्च के आधार पर तय कीमत पर दे सकती हैं। इससे सरकार को बिजली खरीद के लिए ज्यादा भुगतान करना होगा।” वहीं झारखंड सरकार में मंत्री सरयू राय ने इस पर कहा कि बिजली की दर तय करने का अधिकार झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग के पास सुरक्षित है और आयोग घाटे का सौदा क्यों करेगा। झारखंड के महालेखाकार भी ऊर्जा नीति में संशोधन को घाटे का सौदा बताते हैं। ऊर्जा सचिव को भेजे अपने पत्र में उन्होंने कहा कि इन संशोधनों से राज्य सरकार को हर साल करीब 296 करोड़ रुपये और अगले 25 सालों में करीब 7410 करोड़ रुपये का घाटा हो सकता है। अडाणी समूह ने बांग्लादेश को 25 साल तक 1600 मेगावॉट बिजली देने का करार किया है। इस दौरान अडाणी समूह राज्य के बाहर स्थित अपने दूसरे प्लांट से झारखंड सरकार को 400 मेगावाट बिजली देगा।

समाचार एजेंसी के जांच में यह बात सामने आयी है कि अडाणी समूह से एमओयू के पहले सरकार ने गोड्डा की जमीन की कीमत तय करने के लिए एक कमेटी बना दी थी। साल 2014 में वहां के तत्कालीन उपायुक्त ने जिस जमीन की कीमत प्रति एकड़ करीब 40 लाख तय की थी, इस कमेटी ने उसकी कीमत घटाकर करीब सवा तीन लाख प्रति एकड़ कर दी। जबकि झारखंड में जमीन अधिग्रहण की स्थिति में बाज़ार भाव का चार गुना मुआवज़ा देने का प्रावधान है। पहले की कीमत के मुताबिक प्रति एकड़ करीब डेढ़ करोड़ रुपये का मुआवज़ा मिलता था। लेकिन नई कीमतों के मुताबिक मुआवज़े की रकम करीब 13 लाख प्रति एकड़ हो गई है। तब विपक्ष के ज़ोरदार हंगामे के बाद सरकार ने तत्कालीन मुख्य सचिव राजीव गौवा की अध्यक्षता में नई कमेटी बनाकर उसे कीमतों के निर्धारण का जिम्मा सौंपा। उस कमेटी ने नई क़ीमतें तय कीं, जो पहले से अधिक थीं लेकिन कमेटी ने जमीनों का वर्गीकरण कर दिया। अब जमीन की कीमत प्रति एकड़ करीब 6 लाख रुपये न्यूनतम और 13 लाख रुपये अधिकतम हो गई। मतलब, पहले जिस रैयत को डेढ़ करोड़ रुपये का मुआवजा मिलता, उसे अब अधिकतम 52 लाख रुपये का ही मुआवज़ा मिलेगा।

गौरतलब है कि बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि यह सारी कवायद इसलिए की गई ताकि अडाणी समूह को मुआवजे की रकम बांटने में फायदा पहुंचाया जा सके। “जब हमने इसका विरोध किया, तो मेरी पार्टी के नेता और स्थानीय विधायक प्रदीप यादव पर कई मुकदमे लाद कर सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया। उन्हें कई महीने जेल में गुजारने पड़े। वे अडाणी समूह के लिए कथित तौर पर जबरन जमीन अधिग्रहण के विरोध में अनशन पर बैठे थे, तब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था।” हालांकि झारखंड के राजस्व, निबंधन और भूमि सुधार मंत्री अमर बाउरी ने इस आरोप को गलत बताया है। उन्होंने कहा, “गोड्डा में जमीन के मुआवजे की दर निर्धारित करने के लिए सरकार ने हाई लेवल कमेटी बनाई थी। मुख्य सचिव उसकी अध्यक्षता कर रहे थे। उस कमेटी की सिफारिशों के आधार पर वहां जमीन की कीमत तय की गई। यह काम संथाल परगना प्रमंडल के सभी जिलों (देवघर छोड़कर) में किया गया। यह अनर्गल आरोप है कि सरकार ने अडाणी समूह को फायदा पहुंचाने की नीयत से गोड्डा में जमीन की कीमतें कम की।”

अडाणी समूह ने भी जबरन जमीन अधिग्रहण के आरोपों से इनकार किया है। अडाणी समूह के प्रवक्ता ने कहा कि गोड्डा प्लांट के लिए जितनी जमीन चाहिए थी, उसका अधिग्रहण हो चुका है। कंपनी का कहना है, “97 फीसदी रैयतों ने मुआवजे का पैसा भी ले लिया है। इसलिए कंपनी पर जोर-जबरदस्ती के आरोप सिर्फ अफवाह हैं। कुछ लोग निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं।” अडाणी समूह के प्रवक्ता ने कहा कि गोड्डा परियोजना के लिए उन्हें अब और जमीन नहीं चाहिए।

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