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अहिंसा के पुजारी की जयंति के दिन किसानों पर लाठीचार्ज

Hisar Today

महात्मा गांधी जिनका लिबास धोती और एक सूती कपडे से ढका शरीर, गांधी जी ने समस्त विश्व को सदेंश दिया था की अहिंसा ही सबसे बड़ी ताकत है। परंतु 2 अक्टूबर को जब पूरा देश अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन मना रहा था, उसी दिन दिल्ली से सटे यूपी बॉर्डर पर अपनी मांगों के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते आए हज़ारों किसानों पर पुलिस पानी के बौछार, रबर की गोलियां और आंसू गैस के गोले चला रही थी। क्या यही सिखाया है महात्मा गांधी जी ने हमारे देश को। जिन किसानों के कारण हमारे पेट की भूख शांत हो रही है, जब वही किसान अपनी मांगो को मंगवाने के लिए दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और सरकार उनका मुंह बंद करवाने के लिए लाठी-डंडों का इस्तेमाल करे।

यह महात्मा गाँधी को सरकार से अनुपम श्रद्धांजलि देकर शर्मसार कर दिया और दिखा दिया कि चुनाव में किसानों के नाम पर वोट खाओ और बदले में अत्याचार करो। यह कैसी मोदी और योगी सरकार है जो किसानों के जीवन बदलने की बात करती है और बदले में कई बार से सूखा झेल चुके इन किसानों पर पानी की तेज बौछार का इस्तेमाल करती है ताकि ये लोग दिल्ली में न घुस सकें। आखिर क्यों डर रही है मोदी सरकार किसान से। जब महात्मा गांधी ने अग्रजों को नहीं छोड़ा तो भला ये किसान उन लोगों को कैसे छोड़ेंगे, जिनकी आदत कुुछ कुछ अंग्रेजी शासन काल की तरह हो चुकी है।

बड़ी दर्दनाक घटना। अपने साथियों के पैरों और हाथों से बहते खून को दिखाते ये किसान कहते हैं, “चुनाव के वक्त कर्जमाफी का वादा करते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं। किसानों के साथ मज़ाक बना रखा है। साढ़े चार साल हो गए। किसानों पर कर्ज सरकार की गलत नीतियों की वजह से है। झूठ बोल के वोट हासिल किए। अगले चुनाव में कतई स्वीकार नहीं करेंगे। ये हम पर गोलियां चला रहे हैं।’’ भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले ये किसान अलग-अलग राज्यों से जुटे। यूपी बॉर्डर पर दिल्ली में घुसने का इंतज़ार करते ट्रैक्टरों में बैठी महिलाएं अपनी-अपनी भाषा में लगभग एक ही बात कहती हैं- कर्ज माफी, बिजली का बिल, गन्ने का भुगतान और किए वादों को पूरा करो

किसान यूनियन के राकेश टिकैत कहते हैं, “लाठी, पानी और आंसू गैस के गोले आंदोलन के प्रसाद हैं। किसी-किसी को नसीब होए है ये। जब ये हज़़ारों किसान दिल्ली के बॉर्डर पर रुके हुए थे, तब किसान यूनियन का एक प्रतिनिधि मंडल गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिल रहा था। खबर है कि सरकार और किसानों के बीच अहम मांगों को लेकर सहमति बन गई। लेकिन एयरकंडीशन कमरों में हुई इन बैठकों की खबर सड़क पर बैठे हज़ारों किसानों को नहीं थी। इस रैली में किसी भी राज्य से आए किसान से उनकी मांगों के बारे में पूछें तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का ज़िक्र ज़रूर करते हैं। अब से 14 बरस पहले 2004 में स्वामीनाथन की अध्यक्षता में ‘नेशनल कमिशन ऑन फॉरमर्स’ बना था।

इस आयोग ने किसानों की बेहतरी के लिए कुछ सिफारिशें की थीं, जिनका ज़िक्र संभवत: सिर्फ चुनावी मंचों पर हुआ। फसल उगाने वाले किसान के लिए जमीन पर हालात नहीं बदले। किसानों का कहना है कि स्वामीनाथन आयोग में ये सिफारिशें रखी गई हैं कि कम दाम में अच्छी क्वालिटी के बीज मिले, किसानों के लिए ज्ञान चौपाल, महिला किसानों को क्रेडिट कार्ड बने, प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कृषि जोखिम फंड हो, फसल उत्पादन मूल्य से 50 फीसदी ज्यादा दाम, बेकार पड़ी जमीन को भूमिहीन किसानों में बांटा जाए, वनभूमि को कृषि से इतर कामों के लिए कॉरपोरेट को न दें, सबको मिले फसल बीमा की सुविधाएग्रीकल्चर रिस्क फंड बनाया जाए। स्वामीनाथन आयोग की ये सिफारिशें अब तक सरकारी फाइलों में ही सीमित हैं। एक पांच सितारा होटल के सामने सड़क पर फुटओवर ब्रिज की परछाईं में किसानों की भीड़ सुस्ता रही है।

सरकार ने किसानों के लिए किसान चैनल भी शुरू किया था। जब पत्रकार कई किसानों से ये सवाल किया कि किसान चैनल से कभी कोई मदद नहीं मिली? ज्यादातर इस सवाल पर हंसते और गुस्साए हुए बोले, ‘हां बड़ी मदद हो रई है चैनल से… 10 दिन से चल रहे हैं, तब तो किसी चैनल ने ना ली हमारी खबर।’प्रदर्शन में बैठे राकेश टिकैत कहते हैं, “गन्ना भुगतान को 14 दिन में करने का वादा था। आठ महीने हो गए, कुछ न हुआ। 10 साल पुराने ट्रैक्टर बंद कर दिए हैं। देश के संगठन अलग हो सकते हैं, लेकिन सारे किसानों के मुद्दे एक ही हैं। अभी किसानों का दर्द है। भारत सरकार डॉक्टर है। इलाज के लिए आए हैं। दवाई लेने आए हैं, लेकिन दवाई नहीं मिल रही है। हमारी मांगें केंद्र सरकार से ज़्यादा है। आश्वासन चार साल से मिल रहे हैं, लेकिन काम नहीं हो रहा। सरकार कोई भी हो, ढंग का काम नहीं हो रहा।’’

इन किसानों को रोकने के लिए करीब एक हजार सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं। राकेश टिकैत के अनुसार, “संख्या का क्या है जी। हम कोई गिनने थोड़ी जा रहे हैं।’’ सुरक्षाबलों की सही संख्या बॉर्डर पर बताने से ज्यादातर अधिकारी बचते दिखे। लेकिन ये संख्या इतनी तो थी कि कुछ जगहों पर किसान कम और रेपिड एक्शन फोर्स या पुलिस के लोग ज्यादा नजर आ रहे थे। किसानों की इस रैली का मिजाज सुबह पुलिस की फायरिंग के बाद कुछ बदला। जो किसान अब तक अपनी मांगों को लेकर विरोध कर रहे थे, अब उनकी आवाज और बातों में आक्रोश था।

मीडिया के कैमरों को देखते हुए वो ये कहने से ना चूकते- ये नेता हमारी बातें कर-करके दिल्ली पहुंच लेते हैं, लेकिन हमारी मांगों को सुनने के लिए हमें दिल्ली में नहीं आने देते, उल्टा हमारा ही खून बहाते हैं। जिन किसानों के पैरों में चोट आई है, वो अपने जख्मों के साथ उस फ्लाईओवर के नीचे लेटे हुए हैं, जो यूपी और दिल्ली को बांटती है। पुलिस की ओर से इलाज के लिए उठने की बात कहने पर किसान पुलिस पर गरजते नज़र आते हैं। हालांकि ज़मीन पर अन्न उगाने वाले किसानों की इस लड़ाई में बुनियादी फर्क पुलिस बैरिकेट्स के दोनों तरफ देखा जा सकता था। जिसने एक दीवार पैदा कर दी सरकार और किसान के बिच जो शायद हमेशा के लिए हो।

केंद्र और यूपी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए वो कहते हैं, “हमने कर्जमाफी की। मोदी जी के नेतृत्व में काफी काम हुआ है। यूरिया की कालाबाजारी रुकी है। किसानों के लिए सरकार काफी गंभीर है। सालों से उपेक्षित पड़े किसानों को हमने राहत देने की कोशिश की है। किसानों को भारी राहत मिली है। सरकार के इस सफाई पर विपक्ष ने अपनी राजनीति शुरू की और ट्विटर ट्वीट से भर गया। इस मामले पर “कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, “लाठी गोली की है भरमार। किसानों से बर्बरता पूर्ण व्यवहार, बदलेंगी ऐसी मोदी सरकार!’’ राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “अब किसान देश की राजधानी आकर अपना दर्द भी नहीं सुना सकते।’’ हालांकि गांधी जयंती और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन पर ‘जय जवान, जय किसान’ के ट्वीट कृषि मंत्री की फीड में देखे जा सकते हैं। 70 की उम्र पार कर चुकीं हरियाणा की सोनबरी किसान यूनियन से हैं। वो कहती हैं, “म्हारा कई महीने का पेमेंट रुक रहा है। बिजली का बिल घटाने की बजाय बढ़ा दिया। हर साल छूट मिलती थी, इस साल छूट भी नहीं मिली।’’

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