संपादकीय

असल मुद्दों से भटक कर “हिदुतत्व” पर अटके राहुल गांधी

Archana Tripathi,Today News

मध्यप्रदेश चुनाव और इस बार कांग्रेस प्रमुख की यात्रा को कांग्रेस पार्टी ‘नरम हिन्दुत्व’ के साथ पेश कर रही है जो संभवत: कांग्रेस का आगामी विधानसभा चुनाव में प्रचार की मुख्य रणनीति को साफ दर्शाता हैं। राहुल गांधी के स्वागत में उनके रोड शो के रास्ते पर कांग्रेस के नेताओं ने जो पोस्टर और बैनर लगाये, इनमें से कई में राहुल को ‘‘शिव भक्त’’ बताया गया। तो कई जगह सभास्थल पर मंच के समीप टी-आकार का एक रैंप बनाया गया है, ताकि वह कार्यकर्ताओं के करीब जाकर उनसे सवाल-जवाब कर सके। कांग्रेस मध्य प्रदेश में राहुल की मानसरोवर यात्रा के बाद, पहले ही घोषणा कर चुकी है कि वह आगामी विधानसभा चुनावों में राम के नाम का सहारा भी लेगी। कांग्रेस इस बार मध्यप्रदेश चुनाव में मूल मुद्दा छोड़ कर हिन्दुतत्व का कार्ड खेलने की कोशिश कर रही हैं। इसी रणनीति के तहत हाल में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ने एक जनसभा को सम्बोधित कर कहा था कि प्रदेश में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद सूबे की नई सरकार, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का राम पथ बनाने का वादा पूरा करेगी।

मध्य प्रदेश में इस साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसी के मद्देनज़र वहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का रोडशो रखा गया था जो सफल भी रहा। गांधी परिवार से जुड़े इस युवा नेता को देखने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग जुटे जो वहां औपचारिक तौर पर चुनाव अभियान का बिगुल बजाने के लिए पहुंचे थे। राहुल ने अपनी भोपाल यात्रा की शुरुआत की पीर गेट पर मौजूद ‘राजू टी स्टॉल’ से जहां रुककर उन्होंने चाय और पकौड़े खाए। और यह हल्की फुल्की तस्वीर के साथ राहुल गाँधी का रोड शो एक महत्वपूर्ण रेड शो में तब्दील हो गया। सभी यही टकटकी लगाए।

आमतौर पर जब किसी राज्य में चुनाव नज़दीक आ रहे हों तो चर्चा का विषय होता है मौजूदा मुख्यमंत्री ने क्या किया और क्या नहीं कर पाए, ख़ासकर तब जब वो वहां 13 साल तक शासन कर चुके हों। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने कई मुद्दे हैं जो सरकार की नाकामी दिखाते हैं, जैसे कि अपराधों की बढ़ती संख्या, खासकर महिला और बच्चों कि खिलाफ होने वाले अपराध। हाल में करोड़ों का व्यापमं घोटाला सामने आया था जिसने कई युवाओं से मेडिकल कॉलेज में दाख़िले और सरकारी नौकरियों में उनका हक़ छीन लिया था। हाल में एक ई-टेंडर घोटाला भी सामने आया था जिसमें कथित तौर पर ठेकेदारों और नौकरशाहों के बीच एक आपराधिक सांठ-गांठ होने की बात सामने लाई थी जिसका असर वास्तविक व्यापारियों और उद्यमियों पर पड़ रहा था। लेकिन इन सब मुद्दों के होने के बावजूद भोपाल में जो होर्डिंग्स राहुल की यात्रा के दौरान देखे गए उनमें तिलकधारी ‘शिवभक्त’ राहुल गांधी दिखाई दे रहे थे।

धर्म के लिए कांग्रेस का जुनून कोई नई बात नहीं है, ख़ासकर राज्य में बहुसंख्यक समुदाय से नज़दीकी बनाने के लिए ये नया नहीं है। 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने फैजाबाद में सरयू नदी के तट से अपने लोकसभा के चुनावी अभियान की शुरुआत की थी। उनका वादा राम राज्य का था। राजीव गांधी चुनाव हार गए थे, जिसके बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार ने सत्ता संभाली थी। इस गठबंधन सरकार को बीजेपी और वामपंथी दलों का समर्थन प्राप्त था। लेकिन क्या राहुल गांधी को लगता हैं कि इतने ज्वलनशील मुद्दों के बावजूद इस हिदुत्व कार्ड उन्हें चुनाव में जीत दिलवा पाएगा।
कहते हैं कि जाति विवाद शिवराज चौहान के सामने सबसे बड़ी मुश्किलें हैं। फिर से सत्ता में आने के लिए इस बार मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लड़ाई एक अकेले योद्धा की लड़ाई कि भांति प्रतीत होती हैं।

उनकी जन आशीर्वाद यात्रा के लिए प्रभात झा को छोड़कर बीजेपी का कोई वरिष्ठ नेता या केंद्रीय मंत्री उनके साथ मंच पर नहीं पहुंचा। यात्रा में नहीं आने वालों की सूची कहीं लंबी है जिसमें केंद्रीय मंत्रियों और बीजेपी पार्टी कार्यकर्ताओं के नाम भी इसमें शामिल हैं, जैसे नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गहलोत, उमा भारती, कैलाश विजयवर्गीय और कई अन्य। वैसे माना जाता हैं कि हाल में शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता घटी है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में हालिया संशोधनों पर राज्य में दोतरफा नाराजगी के स्वर उठने लगे हैं।

ताकतवर ऊंची जाति के लोग पहले ही अनुसूचित जाति और जनजाति के सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण का विरोध कर रहे हैं। ये लोग मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार के एससी-एसटी कानून में बदलाव लाने के फैसले से खफा हैं जिसके तहत एससी या एसटी समुदाय के लोगों के खिलाफ अत्याचार के मामले में किसी के लिए अग्रिम ज़मानत के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। जाति विवाद के इस मुद्दे को इस तरह से साफ देखा जा सकता है कि हाल में सवर्णों के द्वारा आयोजित भारत बंद में कुछ प्रदर्शनकारियों ने जो टी-शर्ट पहनी थी उन पर ‘हम हैं माई के लाल’ लिखा था। ‘हम हैं माई के लाल’- इस नारे को जून 2016 के उस मौके के संदर्भ में देखा जा सकता है जब शिवराज सिंह चौहान ने आरक्षण नीति की किसी भी तरह की समीक्षा से इनकार कर दिया था और एक योद्धा की तरह कहा था ‘कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता। (नौकरियों में आरक्षण खत्म नहीं हो सकता।)’
लेकिन जाति विवाद में एक मुश्किल स्थिति तब बन गई जब केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर बीजेपी की सरकार है और वायदों के पूरे होने में देरी या ना पूरे होने की गुंजाइश कम है।

जाति विवाद बढ़ा तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मध्य प्रदेश में 12 सितंबर से शुरू होने वाले अपने राजनीतिक कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया। मध्य प्रदेश के लिए कृषि उसकी जीवनरेखा है। यहां की आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा कृषि या कृषि संबंधित गतिविधियों पर ही निर्भर करता है। इस साल जून में यहां खेती से जुड़े कई प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों ने सफल ‘गांव बंद’ आंदोलन का आयोजन किया। उन्होंने विरोध जताने के लिए खेतों में होने वाले उत्पादन को गांव से बाहर बेचना पूरी तरह बंद कर दिया। इनमें खेती से जुड़े कुछ संगठनों ने अब ‘नवंबर 2018’ में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र ‘वोट बंद’ की धमकी भी दे डाली है। देश के 100 से अधिक किसान संगठनों का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ ने हाल में ‘गांव बंद’ आंदोलन में हिस्सा लिया था। किसानों की नाराज़गी को वोट में तब्दील करने के लिए कांग्रेस महासंघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी, केदार सिरोही या अन्य किसी ताकतवर किसान नेता के संपर्क में नहीं हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस को बहुजन समाज पार्टी के साथ अपने गठबंधन को जल्द ही मजबूत करने की जरुरत है क्योंकि यहां लगभग 40 ऐसी सीटें हैं, जहां बसपा का वोट बैंक है। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। ये नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए को हराने के लिए राहुल गांधी का मनोबल बढ़ाने का काम कर सकते हैं।

रही बात लोकसभा चुनावों की तो ये भी राज्यों में ही लड़े जाएंगे। लोकसभा की सभी 543 सीटें राज्यों में ही तो हैं। 1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सत्तारुढ़ बीजेपी सरकार को हराने में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन एक अच्छा उदाहरण रहा है। तेलंगाना में टीडीपी, कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के साथ में आने के फैसले को अवसरवाद कहा जा सकता है लेकिन यह राजनीति की भाषा में व्यावहारिक है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी और उनके काम करने का तरीक़ा, ममता बनर्जी, वाम दलों, कांग्रेस, चंद्रबाबू नायडू और अलग-अलग विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के साथ आने का एक उत्तम समय है। लेकिन इसके लिए राहुल गांधी को मंदिर-मंदिर घूमने और चाय पीने की बजाए इन मुद्दों को समझना और उठाना होगा। राहुल गांधी को यह बात समझ आनी चाहिए कि वह जिस प्रकार से केंद्र में राफेल का मुद्दा उठाकर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। जरुरी हैं कि राहुल मध्यप्रदेश में हुए घोटाले और अन्य मुद्दों के साथ भाजपा को चुनौती दे। वर्ण ऐसा न हो कि देरी से समझ आने के चलते राहुल के हाथ निराशा लगे।

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