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अल्पेश का सद्भावना उपवास ठाकोर सेना के पापों का पश्चाताप

Hisar Today

इन दिनों गुजरात में उत्तर-भारतीयों पर हमले के बीच चारों ओर से घिरे कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर ने सद्भावना उपवास शुरू कर दिया है। अल्पेश ने इसमें यूपी-बिहार के मुख्यमंत्रियों से भी शामिल होने की अपील की है। अल्पेश का कहना है कि उनके गुजरात की छवि खराब की जा रही है, इसलिए वह उपवास कर रहे हैं। अल्पेश ठाकोर ने कहा, ‘मैं सद्भावना उपवास कर रहा हूं। क्यूंकि मेरे गुजरात कि छवि खराब हो रही हैं। गुजरात में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। यहां किसी पर हमला नहीं हुआ बल्कि सोशल मीडिया की वजह से माहौल खराब की जा रही है। हमने कभी क्षेत्रवाद को समर्थन नहीं दिया और न ही आगे कभी देंगे।’ बता दें कि उत्तर भारतीयों पर हमलों के मामले में गिरफ्तार हुए लोगों में ज्यादातर के ठाकोर सेना से संबंध होने और अल्पेश के विवादित बयान के बाद अल्पेश विवादों के बदलो में घिर गए हैं। इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अल्पेश से फोन पर बातचीत की। अल्पेश के ‘गुजरात क्षत्रिय ठाकोर सेना’ के विडियो वायरल हो रहे हैं। इन विडियोज में उन्हें और उनके साथियों को प्रवासी मजदूरों के खिलाफ लोगों को भड़काते देख जा रहा है। हालांकि ठाकोर ने अब डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा है कि मेरी हिंसा में कोई भूमिका नहीं है और अब वह सद्भावना उपवास पर बैठने की बात कर रहे हैं। यही नहीं उन्होंने यूपी और बिहार के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर सफाई भी दी कि वह और उनकी सेना इस हिंसा में शामिल नहीं थे। यहां तक कि प्रवासी लोगों को उन्होंने ‘मेरे भाई’ लिखकर संबोधित किया।

बता दें कि गुजरात के साबरकांठा में 28 सितंबर को 14 महीने की मासूम से रेप में बिहार से आए एक कामगार का नाम सामने आने के बाद से गुजरातियों के निशाने पर यूपी और बिहार के लोग हैं। इस दौरान कई उत्तर भारतीयों पर हमले भी हुए हैं। गुजरात से प्रवासियों को बाहर करने की धमकी देने के आरोप ठाकोर सेना और उससे जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाए जा रहे हैं। 2011 में अल्पेश ठाकोर ने इसकी स्थापना की थी और इसका संचालन अहमदाबाद से किया जा रहा है। इसे बनाने का उद्देश्य गुजरात की अन्य पिछड़ी जातियों में शामिल ठाकोर समुदाय का उत्थान करना था। 28 सितंबर को हिम्मतनगर के एक गांव में 14 महीने की एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था। लड़की का परिवार ठाकोर समुदाय से है। इस मामले में बिहार के एक युवक पर आरोप लगे हैं। देखते ही देखते यह विवाद ठाकोर समुदाय बनाम प्रवासी का मामला बन गया।

इधर बीजेपी ने प्रवासियों को धमकी देने का आरोप कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर पर लगाया। आरोप प्रत्यारोप के बीच गुजरात से निकलकर सैकड़ों प्रवासी मजदूर अपने अपने घर चले गए। इससे ठाकोर सेना चर्चा में आ गई। गुजरात में गृह राज्य मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा ने कहा कि गुजरात में अशांति पैदा करने और प्रवासियों को धमकी देने और मारपीट के 61 मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 543 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें से 20 लोग कांग्रेस से जुड़े हैं और उनकी कॉल रिकॉर्ड और व्हाट्सऐप ग्रुप की छानबीन की जा रही है। वो कहते हैं, “ज्यादातर लोग ठाकोर सेना नामक संगठन से जुड़े हुए हैं, इस पर जांच जारी है। इस मामले में अहमदाबाद अपराध शाखा के ज्वाइंट कमिश्नर जेके भट्ट ने कहा कि, ‘हमने नगीन राठौड़ (ठाकोर) की गिरफ्तारी की है। वो दो साल से ठाकोर सेना की मीडिया सेल के लिए काम कर रहे हैं। ‘वो कहते हैं, ‘इसके अलावा जगदीश ठाकोर नाम के एक शख्स को भी सोशल मीडिया में उकसाने वाले मैसेज फैलाने के मामले में गिरफ्तार किया गया है।’

गुजरात पुलिस की साइबर सेल ने सोशल मीडिया पर उकसाने वाले मैसेज फैलाने वाले लोगों की सूची बनाई है और उनकी गिरफ्तारी की योजना बनाई है। वैसे ठाकोर सेना ही क्यों? ठाकोर समाज की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए और समाज में फैले सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को दूर करने के साथ ही समाज में एकता स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर अल्पेश ठाकोर ने इस ठाकोर सेना की स्थापना 2011 में की थी। अल्पेश कहते हैं, ‘सरकार ने बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में हमारी सभी मांगे मान ली थी इसलिए हमने अपना आंदोलन ख़त्म कर दिया था। लेकिन इसके तीन दिन बाद हिंसा की शुरुआत हुई। जो अपने आप में बहुत कुछ बयान करती है। अल्पेश ठाकोर ने हाल में हिंदी भाषी राज्यों के लोगों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए एकदिवसीय सद्भावना उपवास किया । इस दौरान उन्होंने बीजेपी के सभी आरोपों का खंडन किया।

जब उनसे पूछा गया कि प्रवासियों के खिलाफ हिंसा भड़काने से जुड़े करीब 50 मामले दर्ज किए गए हैं तो उन्होंने कहा कि ठाकोर समुदाय के लोगों को डराने के लिए लिए झूठे केस दर्ज किए गए हैं। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अगर राज्य सरकार उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम रहती है तो वो उन्हें सुरक्षा देंगे। अल्पेश के मुताबिक उनके ठाकोर संगठन में अभी ढाई लाख सक्रिय सदस्य हैं। गुजरात में ठाकोर राजनीति की जड़ें गुजरात की राजनीति में ठाकोर राजनीति का उदय अचानक नहीं हुआ है। इसकी जड़ें 36 साल पुरानी हैं। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. बिनोद अग्रवाल ने एक न्यूज़ एजेंसी को कहा, ‘1981 में पहली बार छात्रों ने आरक्षण को लेकर आंदोलन किया था जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने दबा दिया था। उस आंदोलन के बाद सोलंकी ने पटेलों पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम को साथ लेकर खाम समीकरण पर राजनीति खेली।’

वो कहते हैं, ‘यूं तो ठाकोर समुदाय अन्य पिछड़ी जाति यानी ओबीसी में शामिल है लेकिन खाम समीकरण बनाने के दौरान उन्हें क्षत्रिय माना गया। उस समय गुजरात के नौ जिलों में ठाकोर मतदाता निर्णायक स्थिति में थे। ‘खाम समीकरण की मदद से 1985 में कांग्रेस ने 182 में से 149 सीटें हासिल कीं जो कि अपने आप में गुजरात की राजनीति में एक रिकॉर्ड है जिसे अब तक कोई पार्टी तोड़ नहीं सकी है। अग्रवाल कहते हैं, ‘सोलंकी से नाराज़ पार्टीदारों को साथ लेकर 1990 में जनता दल के साथ मिलकर बीजेपी ने गठबंधन सरकार बनाई। 1995 और 1998 में बीजेपी ही सत्ता में आई। ‘वो कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी ने पहली बार अहमदाबाद के मेयर के तौर पर एक ठाकोर नेता को मौका दिया और अन्य जिलों के साथ ही तालुका पंचायतों में ठाकोर नेताओं को तरजीह दी गई। इसकी वजह से कांग्रेस की परंपरागत वोट बैंक में बड़ी सेंध लग गई।’ अग्रवाल बताते हैं, ‘इसी के साथ गुजरात में एक बार फिर ठाकोर राजनीति का उदय हुआ है और इसका फायदा 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हुआ।

‘25 अगस्त 2015 के दिन अहमदाबाद के जीएमडीसी (गुजरात मेरीटाइम डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) ग्राउंड में हार्दिक पटेल ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन का बिगुल फूंका। शुरुआत में तो पाटीदारों की मांग थी कि उन्हें ओबीसी कोटे में ही आरक्षण मिले। अगर पाटीदारों को ओबीसी कोटे में आरक्षण मिलता तो ठाकोर हित को ठेस पहुंच सकती थी। इसलिए ठाकोर सेना सक्रिय हो गई। गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान ठाकोर सेना ने शराब की बिक्री पर जनता रेड के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। जिसमें ठाकोर महिलाएं और युवा भी जुड़े। कांग्रेस ने अल्पेश ठाकोर को राधनपुर सीट से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया और इसका फायदा उसे राधनपुर के आसपास की ठाकोर बहुतायत वाली सीटों पर भी मिला। इस बीच दलितों के नेता के तौर पर जिग्नेश मेवाणी उभरे जिन्होंने दलितों की मांगों को लेकर आंदोलन छेड़ा। यही वो समय था जब गुजरात की राजनीति में तीन नए युवा नेताओं का उदय हुआ।

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