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अभिमन्यु के सहारे जाटों की राजनीति शुरू

Hisar Today

30 सितंबर को कैप्टन अभिमन्यु गोहाना में रैली करने जा रहे हैं। मगर अभिमन्यु के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने 30 सितम्बर के दौरे में कैप्टन अभिमन्यु को गोहाना में न घुसने देने का ऐलान कर अपनी राजनीति शुरू कर दी है। मगर सवाल यह उठ खड़ा होता है कि क्या वाकई विरोध करने वाले जाट आरक्षण के मुद्दे पर अभिमन्यु को घेरने का षड्यंत्र बना रहे हैं या कैप्टन की रैली का विरोध करने वाले इन जाट नेताओं के पीछे शक्ति कोई और है? यह सवाल उठाना इसलिए भी लाजमी है क्यूंकि खुद कैप्टन अभिमन्यु के करीबी सतपाल श्योराण का मानना है कि विरोध करने वाले कोई जाट नहीं बल्कि कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा पैसे देकर बुलाये हुए कामगार हैं और इसमें यशपाल मलिक केवल चंदे के लिए जाट आरक्षण को मुद्दा बनाकर एक तीर से दो शिकार करने की फिराक में है। सतपाल का यह भी कहना था कि आज कोई भी जाट इन लोगों के साथ नहीं है। सभी यशपाल मलिक की चालाकी समझ चुके हैं।

क्यूंकि यशपाल मलिक सिर्फ चंदे के पैसों को हजम करने के लिए काम कर रहा है, जबकि जाटों के बीच उन्हें कोई नहीं पूछता। गौरतलब है कि जिलाध्यक्ष आजाद सिंह लठवाल ने कहा था कि कैप्टन किसी भी दिशा से गोहाना में प्रवेश न कर सके, इसके लिए प्रदेश के 11 जिलों के जाट उस दिन गोहाना पहुंचेंगे तथा अलग-अलग स्थानों के मोर्चे सम्भालेंगे। सीएम और वित्तमंत्री के 9 जिलों द्वारा विरोध के अपने पुराने ऐलान में गोहाना के लिए जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने 2 और जिले जोड़ दिए हैं। वैसे 30 सितम्बर को वित्तमंत्री कैप्टन के गोहाना आगमन पर उनका विरोध अकेले सोनीपत जिला करने वाला था। मगर अब इस प्रदर्शन में 10 और जिले जोड़ दिए गए हैं। इनमें पहले से निर्धारित व बाकी के 8 जिले रोहतक, जींद, पानीपत, कैथल, भिवानी, चरखीदादरी, हिसार और झज्जर हैं।

इन जिलों के साथ गोहाना में करनाल और कुरुक्षेत्र जिलों के जाटों को भी इन लोगो ने पहुंचने की हिदायत दे रखी है। गौरतलब बात है कि हरियाणा सरकार में वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु की कोठी पर पिछले वर्ष जाट आंदोलन के दौरान वर्ष 2016 में हुई आगजनी व तोड़फोड़ के मामले में कांग्रेस नेताओं का नाम सामने आया था। सीबीआई द्वारा जो आरोपी बनाए गए थे, उनमें कई लोगो का सीधा संबंध कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से था। इस मामले में आरोप पत्र में जो नाम शामिल किए गए थे, उनमें यशपाल मलिक के नजदीकी अशोक बल्हारा का नाम भी शामिल था। पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस नेता कृष्णमूर्ति के बेटे गौरव हुड्डा और कांग्रेस के पूर्व विधायक बीबी बत्तरा के पूर्व पीए रहे सचिन दहिया का भी नाम भी इसमें शामिल था। कैप्टन अभिमन्यु प्रकरण में आरोपितों में जिस सबसे प्रमुख नाम अशोक बल्हारा का शामिल था, वो अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय महासचिव और हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।

इसके अलावा विजयदीप पंघाल, सुमित मलिक, राहुल हुड्डा, विजेंद्र, अरविंद गिल, भुवन सिंह, रक्षित, धीरज के नाम शामिल हैं। सूत्रों का मानना है की इनमें से ज्यादातर कांग्रेस पार्टी और खासकर हुड्डा के खास समर्थक थे, इसलिए इसे राजनीतिक तौर पर भी जोड़कर देखा जा रहा है। उस समय जाट नेताओ ने यह दबाव बनाया था कि जिनके नाम जाट आंदोलन में है, सरकार उनके खिलाफ केस पीछे ले ले, सरकार ने तब माहौल को शांत करने के लिए जाट नेताओं के सामने झुकते हुए केस वापस तो ले लिए मगर कैप्टन अभिमन्यु ने अपना केस पीछे नहीं लिया। न केवल इस केस के जरिये उन्होंने यशपाल मालिक जैसे जाट नेताओं को खुले आम चुनौती दी दूसरी तरफ विपक्ष की पोल खोलकर भी रख दी।
ऐसे में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का नाम सामने आने से कांग्रेस की न केवल छवि खराब हुई, बल्कि जाट भी समझ गए कि उन्हें राजनीति के मौहरे के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

इसलिए सभी ने यशपाल मलिक जैसे लोगो से दूरियां बनाना शुरू कर दी। सूत्रों का मानना है कि उनका खेल केवल वित्त मंत्री के कारण ही बिगड़ रहा है। इतना ही नहीं वित्त मंत्री के बेहद करीबी रहे सतपाल का मानना है कि भूपेंद्र हुड्डा आज खुद को बेहद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने यशपाल मालिक जैसे अन्य लोगो को “पेड एम्प्लॉयी” रखा है। आज जो लोग भाजपा की रैली या वित मंत्री कैप्टन अभिमन्यु की रैली का विरोध कर रहे हैं, वो लोग कोई जाट नहीं। इन लोगो को जाटों से लेना देना नहीं। सिर्फ वे जाटों के नाम पर विरोध के बादल तैयार रखकर भाजपा की प्रतिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि 2016 में जाट आंदोलन की आग से पूरा देश हिल गया था। जाट नेताओं ने माना था कि उनके नाम और मुद्दे को कुछ राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए गलत इस्तेमाल किया। जो आगजनी हुई उसमें जाट नहीं विपक्ष के मौहरे व कुछ राजनीतिक पार्टियां शामिल थी। खामखां इसमें जाट बदनाम हो गए।

2019 का चुनाव नजदीक है ऐसे में यशपाल मलिक दुबारा जाट आरक्षण का मुद्दा उठाकर भाजपा को घेरने का काम कर अपनी रानीतिक रोटी सेक रहा है। कांग्रेस के नेता जानते है कि अगर दुबारा सत्ता में आना हैं तो जाट आरक्षण का मुद्दा उनके लिए आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में “जैकपॉट” साबित हो सकता है। ऐसे में विपक्ष इस आग की लपटों को बुझने नहीं देना चाहता। ऐसे में जाट समुदाय इस कश्मकश में है कि आखिर वो अपना नेता किसे माने? क्यूंकि वह भी जान चुके है कि आज हरियाणा में कैप्टन अभिमन्यु के नाम पर यशपाल मलिक जाटों की राजनीति खेल रहे हैं। ऐसे में यह जगजाहिर है कि 2019 आते आते जाटों का मुद्दा और उठेगा मगर क्या ये वाकई जाटों के हक्क में होगा या विपक्षी पार्टियों के हित में यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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