संपादकीय

अच्छे स्कूलों में पढ़ाने के बावजूद ट्यूशन की क्या जरुरत

पिछले दिनों फिर एक सर्वे आया जिसमें कहा गया है कि भारत के बच्चे दुनिया में सबसे ज्यादा ट्यूशन पढ़ते हैं। खास तौर से गणित के विषय के लिए। उस सर्वे में कहा गया है कि भारत में 74 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं। सचाई यह है कि हमारे देश में यह कल्पना ही असंभव है कि कोई ट्यूशन के बगैर भी पढ़ सकता है। बच्चा भले ही तैयार हो जाए, पर मां-बाप की ही नींद हराम हो जाएगी। उन्हें यह बात पचेगी ही नहीं कि कोई बगैर ट्यूशन के कैसे पास होगा। इधर कुछ समय से देश के कई शिक्षाविद ट्यूशन की आलोचना करने लगे हैं। पहली बार ट्यूशन के खिलाफ माहौल बन रहा है। यह विमर्श शुरू हुआ है कि ट्यूशन हमारी शिक्षा पद्धति की असफलता का प्रतीक है।

वैसे यह तय करना मुश्किल है कि स्कूली शिक्षा सचमुच स्तरहीन है या प्राइवेट ट्यूशन लॉबी के प्रचार की वजह से लोग मनोवैज्ञानिक दबाव में आकर ऐसा सोचने लगे हैं। देश के नामी-गिरामी स्कूलों के बच्चे भी टयूशन पढ़ते हैं। आखिर क्यों? आखिर स्कूलों की जरूरत ही क्या है। बच्चे अलग-अलग ट्यूशन पढ़ें और फिर एक कॉमन परीक्षा में बैठ जाएं। पास हुए तो डिग्री मिल जाएगी। स्कूल और टयूशन, दोनों पढ़ने का अर्थ क्या है। बेवजह पैसा और समय दोनों बर्बाद होता है। जरा सोचिए, हमारे बच्चों का जीवन कैसा है। सुबह-सुबह स्कूल के लिए भागिए, फिर घर आकर ट्यूशन के लिए भागिए। मशीन बनकर रह गए हैं वे।

गौरतलब बात है कि आज निजी स्कूलों में बड़े-बड़े शिक्षित शिक्षकों की भर्ती की बाढ़ आ गई है। इन्हीं शिक्षकों के नाम पर निजी स्कूल विद्यार्थियों से एडमिशन फीस के नाम पर मोटी-मोटी रकम वसूली करता है। आजकल अभिभावक अपने बच्चे का एडमिशन उस स्कुल में करवाना ज्यादा पसंद करते है जो अपनी परफॉर्मेंस और स्कूलों से निकलने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए जाने जाते हैं। अक्सर मैंने देखा है कि मुंबई में ऐसे कई स्कूल हैं जहां के बच्चों के पासिंग पर्सेंटेज और अव्वल दर्जे के रिपोर्ट कार्ड देख कर अभिभावक अपने बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूलों में करवाते हैं जहां के बच्चों के पासिंग परसेंटेज अव्वल दर्जे के रहे हों। तो फिर ऐसा क्यों होता है कि जब स्कूल अच्छा है तो एडमिशन करवाने के बाद, यही अभिभावक अपने बच्चों को ट्यूशन क्यों लगाते हैं।

जब उन्होंने यह सोच कर अपने बच्चों का एडमिशन इन स्कूलों में करवाया है कि वहां पर बेहतरीन शिक्षा मिलती है और बच्चों को हायर परसेंटेज मिलता है, तो आखिर में यह ट्यूशन लगाने की जरूरत उन्हें क्यों है? यह बात मेरी समझ से परे है। दरअसल आजकल के अभिभावकों की ऐसी मानसिकता हो गई है कि जब तक उनके बच्चे ट्यूशन में ना जाएं, तब तक वो पास नहीं हो सकते। ट्यूशन को सभी अभिभावकों ने एक हउवा बना रखा है। जिसके चलते जहां पहले के जमाने में मां बाप अपने बच्चों को खुद पढ़ाते थे और वह बच्चे अच्छे संस्कारों के साथ परीक्षाओं में भी अच्छे अंक लाकर अपने मां बाप का नाम रोशन करते थे। आज उसकी जगह हमारे आज के अभिभावक खुद के कामकाज में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उन्हें बच्चों की पढ़ाई की तरफ ध्यान देने की भी फुर्सत नहीं।

ऐसे में वह सोचते हैं कि खुद पढ़ाने से अच्छा है कि उनकी जगह ट्यूशन में ही वह बच्चे पढ़ लें और अच्छे परसेंटेज से उनका बच्चा पास होकर दिखाए। यही सोच आज के अभिभावकों की कमी है। अभिभावकों को यह भी सोचना चाहिए अगर उनका बच्चा स्कूल की पढ़ाई में ही गंभीरता से ध्यान देते हुए खुद से पढ़ाई कर ले तो उसे ट्यूशन भेजने की जरूरत ही न पड़े। मगर आजकल का फैशन है कि आस पड़ोस के लोग भी पूछने लगते हैं क्या आपका बच्चा ट्यूशन नहीं जाता? आप ट्यूशन क्यों नहीं भेजते? जिसके चलते एक स्टेटस के लिए आजकल के पैरंट्स अपने बच्चों को ट्यूशन भेजना चालू कर दिए हैं। आज के अगर टॉपर्स के सूचि या नतीजों की बात करें तो बिना ट्यूशन लगाया विद्यार्थी भी टॉपर्स की लिस्ट में शामिल होता है।

आज कहीं न कहीं इन महंगे शिक्षा संस्थानों की भी है। बेहद शिक्षित अध्यापको की भर्ती कर लेते है मगर वह अध्यापक सभी बच्चों पर सामान धयान नहीं दे पाते हैं कहीं-कहीं तो ऐसा देखा गया है कि शिक्षक जानबूझकर अच्छा नहीं पढ़ाते और अपने कक्षा के बच्चो को स्कुल के बाद निजी तौर पर ट्यूशन देते है। हरियाणा क्या हिसार में भी मैंने यह बात बारीकी से देखा है। हालांकि काफी स्कुल ऐसे है जहां अच्छी शिक्षा मिलती है ऐसे मे सवाल यही है कि ट्युशन की जरुरत क्यों भाई ?

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