राजनीतिसंपादकीयहरियाणा

अंबाला में हो सकता है त्रिकोणात्मक मुकाबला

Hisar Today

अंबाला एक ऐसा शहर है, जो अपने ऐतिहासिक एवं सामरिक महत्व के स्वरूप लिए तो जाना ही जाता है, वैज्ञानिक साजोसामान व उपकरणों के निर्माण संबंधी कारखानों के लिए भी पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। अंबाला हरियाणा की सबसे पुरानी लोकसभा सीट है, जिसका वजूद देश की आजादी से पहले भी मैजूद था। उन दिनों अंबाला लोकसभा सीट का दायरा मौजूदा पंजाब व हिमाचल प्रदेश के काफी बड़े भूभाग तक फैला हुआ था। तब इसे अंबाला- शिमला लोकसभा सीट कहा जाता था यानि हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला तक का इलाका इस सीट के तहत ही आता था। एक खास बात यह भी है कि यह हरियाणा की इकलौती सीट है जो शुरू से अब तक अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित है । इसका कारण शायद यह है कि इस सीट पर दलितो री संख्या हरियाणा में सर्वाधिक है । तकरीबन 17 लाख से अधिक मतदाताओं वाली इस सीट पर लगभग साढ़े सात लाख मतदाता अनुसूचित जातियों के है। शायद हरियाणा की यह इकलौती सीट है, जिस पर जाट समुदाय के मतदाता अल्पमत में हैं।

एक समय ऐसा था कि जब अंबाला लोकसभा सीट से एक साथ दो-दो लोकसभा सदस्य चुने जाते थे। इनमें से एक सामान्य जाति का होता था और दूसरा अनुसूचित जातियों का। बाद में सरकार ने इस व्यवस्था को खत्म कर अंबाला को केवल अनुसूचित जातियों के लिए ही आरक्षित कर दिया। शुरू से ही अंबाला सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। अब तक हुए कुल 16 लोकसभा चुनावों में नौ दफा कांग्रेस के प्रत्याशियों ने यहां बाजी जीती है, जबकि बीजेपी को भी पांच बार यहां से सफलता का स्वाद चखने को मिला है।जहां तक 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सवाल है, तो स्पष्ट है कि बीजेपी अपने पिछले घोड़े रतनलाल कटारिया पर ही दांव लगाएगी। कटारिया सीटिंग एमपी होने के नाते टिकट के हकदार हैं भी। उनके मुकाबले का कोई अन्य प्रत्याशी फिलहाल बीजेपी में नजर नहीं आता। लेकिन इस बार उन्हें पिछली बार की तरह मोदी लहर का फायदा नहीं मिलने वाला। इस दफा वांछित परिणाम हासिल करने के लिए उन्हें काफी पसीना बहाना पड़ेगा। यदि वे पिछले चुनाव के मुकाबले आधे वोट भी हासिल करने में सफल रहे तो वे जीत के दावेदार बन सकते हैं ।

कांग्रेस इस दफा अपने इस पुराने गढ़ को वापिस हासिल करने के लिए पूरा जोर लगाएगी, लेकिन कांग्रेस का प्रत्याशी कौन होगा, इसका अभी कोई अता पता नहीं है। पिछली बार हार का मुंह देखने वाले राजकुमार बाल्मिकी पर कांग्रेस शायद ही इस बार दांव खेलना चाहेगी। उससे पहले 2004 और 2009 में यहां से सांसद रह चुकीं महिला दलित नेता कुमारी शैलजा यहां से मजबूत दावेदार हो सकती हैं, लेकिन चर्चा है कि पिछली बार की हार का आंकड़ा देख कर उनका आत्मविश्वास इस दफा डगमगाया हुआ है और अपनी पुरानी सीट सिरसा (सुरक्षित) का रूख करने पर विचार कर रही हैं, लेकिन वहां प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष अशोक तंवर का पेंच फंसा हुआ है और मजबूरी में उन्हें अंबाला में ही भाग्य आजमाने पर विवश होना पड़ सकता है।कांग्रेस में यूं तो कई नाम और भी हैं जो यहां से टिकट के दावेदार बने हुए हैं, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और अशोक तंवर के गुटों के बीच टिकटों को लेकर आखिरी दौर में काफी मारामारी होने की संभावना है, जिसे देखते हुए दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता कि अंत में यहां से टिकट किस के हाथ लगेगी?

जहां तक इंडियन नेशनल लोकदल का सवाल है, अंबाला लोकसभा सीट उसके लिए कभी भी आसान सीट नहीं रही। बार बार हुए समझौतों में इनेलो नेतृत्व यह सीट अपने गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़ती रही है। इनेलो ने 1980, 1989, 1999 और 2009 में यह सीट बीजेपी के लिए छोड़ दी थी और 1998 में बसपा के लिए। इस बार भी इनेलो का बसपा से समझौता है। उम्मीद है कि इनेलो यह सीट बसपा के लिए छोड़ेगी। पिछली बार बसपा के उम्मीदवार ने एक लाख से अधिक वोट हासिल किये थे। देखना दिलचस्प होगा कि इस बार बसपा किसे अपना उम्मीदवार बनाती है।

Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close