टुडे न्यूज़संपादकीय

भाजपा से बेहतर तो हुड्डा कर गए

संपादकीय महेश मेहता

हिसार टुडे

हरियाणा में भाजपा ने सरकार भले ही बना ली हो लेकिन इस चुनाव में अगर किसी ने भाजपा से बेहतरीन प्रदर्शन कर दिखाया है तो वह है सिर्फ हुड्डा और शैलजा की जोड़ी ने। अब आप पूछेंगे की कांग्रेस के नेताओं का नाम लिया मगर पार्टी का नहीं। इसके पीछे कारण है कि कांग्रेस से ज्यादा कांग्रेस के टिकट में चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों ने अपने मेहनत के बूते ही सीट जीती। आज हरियाणा विधानसभा चुनाव के आंकड़ो पर अगर चर्चा की जाए तो भाजपा को जितनी उम्मीद थी, उसे उस उम्मीद के बराबर भी सीट नहीं हासिल हुई। आखिर में भाजपा को जेजेपी के समर्थन के साथ सरकार बनानी पड़ी। इस चुनाव में जहां भाजपा 75 सीटों का मिशन लेकर चल रही थी मगर चुनावी नतीजों ने उनकी हसरतों में पानी फेर कर उन्हें 40 के आंकड़े पर ही अटका दिया। भाजपा का प्रदर्शन ऐसे समय में निराशाजनक रहा जब उन्होंने दूसरे तमाम दलों से मजबूत नेताओं को धड़ाधड़ पार्टी में शामिल करवाया। यह सोचकर कि उनका 75 पार का आंकड़ा पूरा हो जायेगा।

मगर हुआ तो कुछ नहीं मगर यहां सुर्खियां बटोर ले गयी कांग्रेस। पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में बेहतरीन प्रदर्शन कर कांग्रेस ने 31 के आंकड़े में पहुंच कर दिखा दिया कि हरियाणा में कांग्रेस का जोर अभी भी बरकरार है। कांग्रेस ने यह बेहतरीन प्रदर्शन ऐसे समय पर किया है जब ठीक चुनाव के पहले कांग्रेस ने अशोक तंवर को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटाया और बाद में अशोक तंवर ने कांग्रेस में पैसों की एवज में टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस को चुनाव में सामने जाने के पहले ही बदनाम करने की कोशिश की। उन्होंने कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए जजपा के साथ मिलाया और कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन किया।

मगर इस बीच हुड्डा ने अपने ऊपर किसी विरोध को हावी होने नहीं दिया और रणनीति के तहत उन्होंने अपने 10 साल के कार्यों का ब्योरा जनता के सामने रखा। अपने काम गिनाते हुए उन्होंने भाजपा को भी चुनौती दी कि वह अपने 5 साल के वादों और उसे कितना पूरा किया उसका रिपोर्ट कार्ड दे। मगर भाजपा ऐसे कोई रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता के बीच नहीं आयी। इतना ही नहीं हुड्डा ने अपने आप को जाट हितैशी दिखाकर भाईचारा कायम करने का वक्तत्व देकर चुनाव को एकतरफा मोड़ने की कोशिश की। इतना ही नहीं हुड्डा ने उन एग्जिट पोल की भी धज्जियां उड़ा दी जो यह कह रही थी कि कांग्रेस 10 सीटों में सिमट कर रह जायेगी।

अब हुड्डा के जीत के आंकड़ो का आकलन इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा के साथ कड़े मुकाबले की कमान 15 दिन पहले संभालने के बावजूद हुड्डा ने सबसे बड़े अंतर से चुनाव जीता। गढ़ी सांपला सीट से उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्री भाजपा के प्रत्याशी सतीश नांदल को बड़े अंतर से हराया। यहां हुड्डा को 97,330 वोट मिले जबकि नांदल को 39,256 वोट ही मिले। इन दोनों के बीच 58,312 वोट का अंतर था। सूत्रों का कहना है कि हुड्डा की इस जीत के पीछे कुछ इलेक्शन कैंपेनर्स का अहम योगदान है। उन्होंने पूरी रणनीति तैयार की कि किस तरह पिछली सरकार में किए गए भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कामों को जन-जन तक पहुंचाना और उनकी गैरजाट विरोधी छवि को बदलना है। दरअसल 2016 में हुए जाट आंदोलन के बाद हुड्डा की छवि गैरजाट विरोधी के रूप में बन गई थी।

साथ ही लोगों का मानना था कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मिलना आसान नहीं है क्योंकि उससे पहले चार चौधरियों से मिलना पड़ता है। प्रोफेशनल्स की टीम ने रिसर्च की और पता लगाया कि हुड्डा की लोकप्रियता को एक बार फिर कैसे बढ़ाया जा सकता है। उनकी गैरजाट विरोधी छवि को खत्म करने के लिए डोर टु डोर कैंपेन किए गए। इन प्रोफेशनलों की टीम में बद्रीनाथ ने रिपोर्ट तैयार करने में अहम योगदान दिया। वह प्रशांत किशोर के साथ आईपैक में कई चुनावों के लिए काम कर चुके हैं। इस पुरे कार्य में आइपैक के पूर्व डायरेक्टर मनीष कुमार और टेक्सस से पढ़े एकांक जतवानी भी मुख्य महत्वपूर्ण भूमिका में रहे।

जिसका फायदा हुड्डा को भरपूर हुआ और नतीजे बेहतर रहे, कांग्रेस को सीटों का सबसे ज्यादा नुक्सान हिसार जिले में हुआ। टिकट ऐसे लोगों को दिए गए कि यह यकीं हो गया था कि हुड्डा चुनाव जीतने के लिए हारने के लिए टिकट दे रहे हैं। कहीं न कहीं उस दौरान अशोक तंवर की बात भी लोगों को सटीक लगाने लगी थी। खैर अब चुनाव गए। मौका है कि इन 5 सालों में न बतौर मजबूत विपक्ष के तौर पर खुद को साबित करना। वरना ऐसा न हो जाए कि कांग्रेस की वही पुरानी बीमारी कि 5 साल चुप रहना और चुनाव आते ही उग्र होना। इसलिए अब हुड्डा को समय है कि वह एकमात्र मजबूत विपक्ष के तौर पर अपनी भूमिका निभाते हुए 2024 में इतिहासिक तौर पर वह कमबैक करे।

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